Barahwin sharif Sahab Ne Kyun Na Manai?

बारहवी शरीफ़ सहाबा ने क्यूँ न मनाई?

हिस्सा 1

 ➡इस में तो कोई शक नहीं कि सहाबा-ए-किराम हुज़ूर“ﷺ” की तशरीफ़ आवरी और आप की पैदाइश का ज़िक्र फ़रमाते थे, जब ग़ैर मुस्लिमों में जाते और उन्हें इस्लाम की दअवत देते तो फ़रमाते थे अल्लाह तआला ने हम में अपना एक रसूल भेजा यानी वह हुज़ूर की तशरीफ़ आवरी का ज़िक्र किसी न किसी तरह ज़रूर
फरमाते थे। 
  और हुज़ूर के ज़िक्र की महफ़िल तो आप के मुबारक ज़माने में आप ही के सामने मस्जिदे नबवी शरीफ़ में मुन्अक़िद होती थी, सही बुख़ारी और मुस्लिम की हदीस में है हज़रत आइशा सिद्दीका रदियल्लाहु तआला अन्हा फ़रमाती हैं!
  रसूलुल्लाह “ﷺ”मस्जिदे नबवी में हज़रत हस्सान इब्ने साबित के लिए एक मिम्बर रखवाते वह उस पर खड़े हो कर हुज़ूर “ﷺ”की तारीफ़ में नअत शरीफ़ पढ़ते और हुज़ूर “ﷺ”के दुश्मनों की ऐब जोइयों का जवाब देते हुज़ूर “ﷺ” खुद सुनते और फरमाते जब उन्होंने हमारी शान बयान की और हमारे दुश्मनों को जवाब दिया। तो अल्लाह तआला हजरत रूहुलकुद्स के ज़रीआ उन की ताईद फरमाता है!
📕मिश्कात बाबुल बयान वश्शिअर,स.410

 ⚡️इस हदीस का मफ़हूम सही बुखारी ज़िल्द 1,किताबुस्सलात बाबुश्शेर फ़िल मस्जिद,स.64पर भी है बल्कि ज़िक्र पाक ए मुस्तफा“ﷺ”की इस मज़्लिस का सिलसिला हुज़ूर के विसाल के बाद भी जारी रहा!
    हज़रत उमर फारूक़ رضي الله عنه‎‎का मस्जिद नबवी शरीफ़ मे गुज़र हुआ तो देखा कि हज़रत हस्सान इब्ने साबित رضي الله عنه‎‎हुज़ूर की शान मे अश्आर पढ़ रहे हैं, उन्होने समझा की शायद हज़रत उमर मना करें या नाराज़ हों, फौरन अर्ज़ किया ऐ हज़रत उमर मैं यह अशआर  उनके ज़माने मे भी पढ़ता था, जो तुम से बहतर है (यानी “ﷺ”) फ़िर हज़रत हस्सान ने हज़रत अबूहुरैरा की तरफ़ देखा और कहा ऐ अबूहुरैरा मैं तुम को अल्लाह का वास्ता देकर पूंछता हूँ आप बताइये क्या आप ने सुना है, जब मैं हुज़ूर की शान मे अश्आर पढ़ता तो हुज़ूर“ﷺ” फरमाते ऐ अल्लाह रूहुलक़ुदस के ज़रीये उनकी मदद फरमा, जैसा कि उन्होंने मेरे दुश्मनों को जवाब दिया! *हज़रत अबूहुरैरा रदिअल्लाहु तआला अन्हु* ने फरमाया हाँ यह सही है!
📕सही बुख़ारी ज़िल्द 1 बाब ज़िकरूलमलाइका स.456

और सही मुस्लिम बाब फ़ज़ाइल हस्सान बिन साबित ज़ि.,2 स.300 पर जहाँ यह हदीस है उस के आगे हज़रत हस्सान के यह अश्आर भी हैं जिनकी तादाद 13 है, उन मे का एक शेअर यह भी है!

 ए हुज़ूर “ﷺ”के दुश्मनों मेरे माँ बाप और मेरा सब कुछ तुम से मुहम्मद  “ﷺ”की हिफाज़त के लिए कुर्बान है!

   ⚡️तो इस में कोई शक नहीं कि ज़िक्रे पाक ए मुस्तफ़ा की महफीलें मुन्अक़िद करना जमाना-ए-पाक रिसालत माआब और सहाबा-ए-किराम में राइज़ था लेकिन बाक़ाइदा तौर पर एहतिमाम के साथ किसी तारीख़ को मुतअय्यन कर के रिवाज़ के तौर पर खुशियाँ मनाना महफिलें मन्अक़िद करना रौशनी करना जुलूस निकालना उस दौर में राइज़ न था लेकिन हम इस सब को सहाबा की सुन्नत कब कहते हैं? न उन की सुन्नत समझ कर करते हैं बस एक कारेखै़र अच्छा काम मुस्तहब समझ कर करते हैं, किसी काम को फर्ज़ व वाजिब या सुन्नत कहने पर सुबूत व दलील की ज़रूरत होती है, लेकिन सिर्फ़ कारे ख़ैर अच्छा काम या मुस्तहब और नफ़िल होने के लिए सुबूत व दलील की ज़रूरत नहीं होती उस का सुबूत यही है कि उसमें कोई ख़राबी नहीं कोई खिलाफे शरअ ग़लत बात नहीं जो कुछ है सब अच्छा ही अच्छा है अच्छी बात है। अच्छों का ज़िक्र है।
  इस बयान को कुछ तफ़सील के साथ हम वाक़ाइदा एक मुस्तक़िल उनवान के तहत लिखना चाहते हैं।
  
📚बारहवीं शरीफ़ जलसे और जुलूस सफ़ा 26,27,28
✍🏻✍🏻मौलाना तत्हीर अह़मद रज़वी बरेलवी

बारहवीं शरीफ़ सहाबा ने क्यूँ न मनाई?

हिस्सा:- 2

बारहवीं शरीफ़ मनाना और जुलूस वग़ैरह सिर्फ़ मुस्तहब


➡दर असल इस्लामी अहकाम चन्द तरह के हैं :-

  *(1)फ़र्ज़ :-* वह काम है जिस को करना इस्लाम में बहुत ज़्यादा ज़रूरी हो और उस का ज़रूरी होना क़ुरआन व हदीस से साफ़ तौर पर साबित हो, और उस को एक बार भी क़स़दन छोड़ने वाला बहुत बड़ा गुनहगार हराम कार जहन्नम का हक़दार कहलाये!

*(2) वाजिब :* जो फ़र्ज़ की तरह ज़रूरी तो न हो और उसके क़ुरआन व हदीस से ज़रूरी साबित होने में कुछ शुबह हो यानी बिल्कुल वाजे़ह और साफ़ न हो इसका मर्तबा फ़र्ज़ से कुछ कम है, लेकिन क़सदन छोड़ने वाला इसका भी गुनहगार है!

*(3) सुन्नत:-* वह काम है जो फर्ज़ व वाजिब की तरह शरअन ज़रूरी न हों लेकिन फिर भी हुज़ूर “ﷺ”  ने उसको किया हो, अगर हमेशा किया हो लेकिन कभी कभार सिर्फ़ इस लिए छोड़ दिया हो कि लोग फर्ज़ व वाजिब की तरह ज़रूरी न समझने लगे, उसको सुन्नते मुअक्किदा कहते हैं और वह काम जिस को हुज़ूर “ﷺ” ने हमेशा न किया हुआ हो बल्कि कभी किया हो और कभी छोड़ा हो उसको सुन्नते ग़ैर मुअक्किदा कहतें है, सुन्नत ए मुअक्किदा को छोड़ने की आदत डालने वाला गुनहगार है, कभी छूट जाये तो गुनाह नहीं और सुन्नते ग़ैर मुअक्किदा को भी आदत के तौर पर छोड़ना शरअन मुनासिब और अच्छा नहीं, और एक बड़े सवाब से महरूमी है। 

   ⚡️किसी काम के फ़र्ज़ व वाजिब या सुन्नत होने के लिए इस का हुज़ूर “ﷺ” या आपके सहाबा से साबित होना ज़रूरी है, इस सब के बाद दर्जा है मुस्तहब का इस को कारे ख़ैर और अच्छा काम भी कह सकते हैं। इस के लिए ज़रूरी नहीं कि वह हुज़ूर “ﷺ” या आप के  सहाबा ने किया हो.फराइज़ व वाजिबात और सुन्नतों की शुमार और गिनती है लेकिन सिर्फ़ अच्छे कामों की कोई हद व शुमार और गिनती नहीं होती, वह कितने भी हो सकते हैं, इन का कोई दाइरा नहीं खींचा जा सकता, किसी भी काम के सिर्फ़ अच्छा और मुस्तहब होने के लिए सिर्फ़ इतना काफ़ी है कि उस में कोई बुराई न हो किसी इस्लामी कानून की ख़िलाफ़ वरज़ी न हो किसी के लिए बाइसे तकलीफ़ न हो, हाँ इसको कोई न भी करे तो वह किसी अज़ाब व इताब का मुस्तहक़ नहीं, जैसे कि फर्ज़,वाजिब और सुन्नतों को छोड़ने वाले उन सज़ाओं के मुस्तहक हैं, हाँ उन से रोकने और मना करने वाला यक़ीनन क़ाबिले सज़ा है, और वह कोई बुरा आदमी होगा, जो अच्छे कामों पर फ़तवे लगा रहा है, और उन से रोक रहा है,बारहवीं शरीफ़ और उस से मुतअल्लिक़ जो कारे ख़ैर हैं जैसे जलसे जुलूस,रौश्नियाँ करना मिठाइयाँ बांटना, सलात व सलाम पढ़ना यह भी सिर्फ़ कारे ख़ैर और मुस्तहब काम हैं, फर्ज़ व वाजिब यानी शरअन लाज़िम व ज़रूरी नहीं और जिस अन्दाज़ से जिस शक़्ल व सूरत में आज किए जाते हैं यह हुज़ूर या आप के सहाबा की। सुन्नत भी नहीं लेकिन कारे ख़ैर जाइज़ व मुस्तहब और अच्छे सवाब के काम होने में शुबह भी नहीं। जैसे सहाबा के ज़माने में कुरआन करीम में ऐराब ज़बर ज़ेर, और पेश वगैरा न थे 30 पारों में तक़सीम न थी,रूकूअ और आयतो के नम्बर न थे यह सब काम उनके बाद हुये और होते ही चले आये!

╭┈►मदरसों में जो उलूम पढाये जाते हैं यह भी न थे, जैसे इल्मे नहव, इल्मे सर्फ इल्मे लुगत, इल्मे कलाम इल्मे मआनी व बयान, इल्मे उरुज़ व क़वाफी, इल्मे मन्तिक व फलसफा,बल्कि जैसे आज मदरसे चलाये जा रहे हैं इस अन्दाज़ के मदरसे भी सहाबा के ज़माने में न थे, और यही मुआमला है, नियाज़ो फातिहाओ का तीजे दस्वें बीस्वें चालीसवा छ: माही बरसी और उरसों वगैरा का। नाम पाक पर अंगूठे चूमने कब्र पर अज़ान पढ़ने अज़ान के बाद तस्वीब यानी सलात पुकारने या नमाज़ के बाद हाथ बांध कर खड़े हो कर अस्सलातु वस्सलामु अलैका या रसूलल्लाह आहिस्ता आहिस्ता पढ़ने का। यह काम जिस अन्दाज़ में आज किए जाते हैं इस तरह सहाबा, से आम तौर पर रिवाजन साबित नहीं, लेकिन उन कामों में कोई बुराई नहीं लिहाज़ा उन्हें बुरे काम भी नहीं कहा जा सकता, बल्कि अच्छाइयाँ हैं लिहाज़ा अच्छा काम ही कहा जायेगा, इन सब कामों में क़ुरआन की तिलावत है अल्लाह और उस के रसूल और महबूब बन्दों का ज़िक्र और उनकी तअरीफें हैं या अहबाब दोस्तों रिशते दारों या ग़रीबों मिस्कीनों को खिलाना और पिलाना है, हाँ अगर कोई उन कामों को न भी करे तो उस पर शरअन जुर्म आइद नहीं होता, और वह गुनहगार नहीं क्योंकि मुस्तहब का माना ही यह है कि न करने वाला गुनहेगार न हो,और करने वाला सवाब पाये।

  ⚡️इस सिलसिले में हमारे कुछ भाई ज़्यादती कर बैठते हैं। अगर कोई शख़्स जुलूस में शरीक न हो, या नियाज़ फातिहा न करे या उर्स वगैरा में न जाये उसे खट से वहाबी, इस्लाम से ख़ारिज कह देते हैं यह सही नहीं। यह तो गुस्ताखों बे अदबों की एक जमाअत का नाम है और जो उनकी बे अदबियों गुस्ताख़ियों को जानते समझते हुये उन में शामिल और इस जमाअत से जुड़ा हुआ है वह भी उन्ही में से है।
     आला हज़रत अलैहिर्ररहमा ने एक जगह अपनी किताब फ़तावा रज़विया में वहाबियों में जो लोग अल्लाह रब्बुल इज्ज़त, शाने रिसालत और सहाबा-ए-किराम की बारगाहों के खुले गुस्ताख़ और बे अदब थे उन पर कुफ्र का फतवा लगा कर बाद में लिखा 
  "हाँ जो बद मज़हब, दीने इस्लाम की ज़रूरी बातों में से किसी बात में शक न करता हो सिर्फ़ उन से नीचे दर्ज़े के अक़ीदों में मुखालिफ़ हो जैसे राफ्ज़ियों में तफसीली या वहावियों में इस्हाकी वगैराहुम वह अगर्चे गुमराह है मगर काफ़िर नहीं इन के हाथ का जबीहा हलाल है। 
📕फ़तावा रज़विया ज़ि. 20 स. 246
📚बारहवीं शरीफ़ जलसे और जुलूस, सफ़ा 29,30,31,32
✍🏻✍🏻मौलाना तत्हीर अह़मद रज़वी बरेलवी

बारहवी शरीफ़ सहाबा ने क्यूँ न मनाई?

हिस्सा 3

➡वहाबियों में यह इस्हाक़ी गिरोह जिस को आला हज़रत अलैहिर्ररहमा ने काफिर न कह कर सिर्फ़ गुमराह फरमाया और उन के जुबह किए हुये जानवर के गोश्त को खाना हराम न कहा यह वह लोग थे जो मौलवी इस्हाक़ देहलवी और उन की किताब मिआतु मसाइल को मानने वाले थे इस किताब में नियाज़ व फातिहा और मीलाद वगैरा रुसूमे अहले सुन्नत की मुखालिफत तो है लेकिन बारगाह ख़ुदा व रसूल में खुली गुस्ताखी और बेअदबी नहीं।

   ⚡️नियाज़ व फातिहा उर्स व जुलूस में शरीक़ न होने वाला सुन्नी भी हो सकता है, जब कि वह बदमज़हबों की किसी तन्ज़ीम से वाबस्ता न हो। हो सकता है कि उस के दिमाग में यह बात न आई हो। कि जो काम हुज़ूर सल्लललाहु अलैहे वसल्लम और सहाबा के ज़माने में न था वह अब क्यों? और हक़ीक़त से नावाक्फियत की वजह से इन्कार भी करे तो उसे जाहिल नादान ना समझ गुमराह तो कहा जाये लेकिन इस्लाम से ख़ारिज या काफिर नहीं इस में एहतियात की ज़रूरत है, किसी भी मुसलमान को बहुत सोच समझ कर ऐसे अल्फ़ाज़ बोलना चाहिए ज़ल्दबाजी में खुद अपने लिए खतरा है। 
   इस में तो कोई शक नहीं कि नियाज़ व फातिहा मीलाद व उर्स वगैरा का इन्कार करना बदमज़हबों का काम है. लेकिन इस में भी कोई शक नहीं कि उन कामों को न करने वाले या इन्कार करने वाले सब बदमज़हब नहीं हैं बदमज़हब वही हैं जो उन की तन्ज़ीमों और तहरीकों से जुड़े हुये हैं, हाँ उन्हें इन कामों के फज़ाइल से आगाह करते रहें कि वह अगर्चे न करे, लेकिन उन उमूरे ख़ैर को बुरा कहने से बाज़ रहें. किसी काम के जाइज़ और नाजाइज़ होने इखिलाफात तो उम्मत में पहले ही से चले आये हैं, हमें चाहिए कि नियाज़ व फातिहा उर्स व मीलाद न करने वालों को भी सुन्नी ही समझें जब तक कि वह किसी दूसरे फिर्के की तहरीक़ में शामिल और उन के गिरोह के फ़र्द न बन जायें और अल्लाह व रसूल की शान में गुस्ताखी न करने लगें। 
     आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खाँ बरेलवी रहमतुल्लाह अलैह से एक बार पूछा गया कि अज़ान के बाद नमाज़ से पहले जो तस्वीब यानी सलात वगैरा पुकारी जाती है इसका क्या हुक़्म है और कोई न पुकारे तो उस को गुनहगार समझना वहाबी नज़्दी ख़्याल करना इस के बगैर नमाज़ में कमी समझना कैसा है। तो उन्होंने जवाब में जो फरमाया उस का मफहूम यह है, तस्वीब जो अज़ान के बाद पढ़ी जाती है वह मुस्तहब व मुस्तहसन है कोई न पढ़े तो उस को गुनहगार जानना या न पढ़ने की वजह से नमाज़ में कोई कमी समझना न पढ़ने वाले इमाम को तक़लीद से ख़ारिज जानना उसे वहाबी नज़्दी कहना यह सब खियालात बातिल और गुमराही हैं और ऐसा एअतिक़ाद रखने वालों पर तौबा फर्ज़ है!
📕फ़तावा रज़विया जि.5 स.388📕
📚बारहवीं शरीफ़ जलसे और जुलूस सफ़ा 33,34
✍🏻✍🏻 मौलाना ततहीर अह़मद रज़वी बरेलवी

✒✒मिन जानिब :- मेम्बरान इल्म की रौशनी

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Barahwin Sharif Sahaba Ne Kyun Na Manai?
Barahwin Sharif Ke Jalse Aur Juloos
Maulana Tatheer Ahmad Razvi 
ILM KI RAUSHNI

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