Bimari Aur Gunahon Ka Kaffara

बीमारी और गुनाहों का कफ़्फ़ारा


➡हज़रत अबु सईद ख़ुदरी رضي الله عنه‎‎ से रिवायत है कि नबी करीम “ﷺ” ने फ़रमाया की:- *मुसलमान को कोई रंज, कोई दुःख, कोई फ़िक्र, कोई तकलीफ़, कोई अज़ीयत और कोई ग़म नहीं पहुंचता यहां तक कि कांटा जो उसे चुभे मगर अल्लाह तआला उन के सबब उसके गुनाहों को मिटा देता है।*
📚बुख़ारी शरीफ, जिल्द 2, सफ़ा 843
📚मिशक़ात शरीफ, सफ़ा 134
📚अनवार उल हदीस, सफ़ा 175

➡हज़रते आईशा सिद्दिक़ा   رضی اللہ عنھا ने कहा कि रसूल ए करीम “ﷺ” ने फ़रमाया की:- *जब बंदा के गुनाह ज़्यादा हो जाते हैं और उसके अमल में कोई ऐसी चीज़ नहीं होती जो गुनाहों का कफ़्फ़ारा बन सके तो अल्लाह तआला उसको ग़म और परेशानी में मुब्तिला कर देता है ताकि उसके गुनाहों का कफ़्फ़ारा बन जाए।*
📚मिशक़ात शरीफ, सफ़ा 138
📚अनवार उल हदीस, सफ़ा 176

➡हज़रत साअ्द رضي الله عنه‎‎ ने फ़रमाया की नबी “ﷺ” से दरयाफ़्त किया गया कि *कौन लोग सख़्त बलाओं में मुब्तिला होते हैं? हुज़ूर “ﷺ” ने फ़रमाया(सब से पहले) अम्बिया ए किराम फिर उनके बाद जो अफ़ज़ल हैं यानी हस्बे मरातिब आदमी में दीन के साथ जैसा ताअल्लुक़ होता है उसी ऐतेबार से बला में मुब्तिला किया जाता है अगर दीन में सख़्त है तो बला भी उस पर सख़्त होगी। अगर दीन में कमज़ोर हैं तो उसपर आसानी की जाती है। यही सिलसिला हमेशा रहता है यहां तक कि ज़मीन पर वो यूं चलता है कि उसपर कोई गुनाह नहीं रहता।*
📚तिर्मिज़ी शरीफ, जिल्द 2, सफ़ा 65
📚इब्ने माजा, जिल्द 2, सफ़ा 291
📚मिशक़ात शरीफ, सफ़ा 136
📚अनवार उल हदीस, सफ़ा 176-177

➡हज़रत जाबिर बिन अतीक़ رضي الله عنه‎‎ ने कहा कि रसूले करीम “ﷺ” ने फ़रमाया की खुदा ए तआला की राह में क़त्ल के अलावा सात(7) शहादतें और हैं:- *1.जो ताऊन में मरे शहीद है, 2.जो डूब कर मरे शहीद है, 3.जो जात उल जनुब(निमोनिया) में मरे शहीद है, 4.जो पेट की बीमारी में मरे शहीद है, 5.जो आग में जल जाए शहीद है, 6.जो ईमारत के नीचे दब कर मर जाए शहीद है, और 7.जो औरत बच्चा पैदाइश के वक़्त मर जाए शहीद है।*
📚अबु दाऊद शरीफ, जिल्द 2, सफ़ा 443
📚मिशक़ात शरीफ, सफ़ा 138
📚अनवार उल हदीस, सफ़ा 177

खुलासा:-

बीमारी से बज़ाहिर तक़लीफ़ पहुंचती है लेकिन हक़ीक़त में वह बहुत बड़ी नेअमत है जिससे मोमिन को अब्दी राहत व आराम का बहुत बड़ा ज़खीरा हाथ आता है इसलिए कि ये जाहिरी बीमारी हक़ीक़त में रूहानी बीमारियों का एक बड़ा जबरदस्त इलाज है बशर्ते कि आदमी मोमिन हो सख़्त से सख़्त बीमारी में सब्र व शुक्र से काम ले। अगर सब्र न करे बल्कि जज़ा-फ़ज़ा करे तो बीमारी से कोई मनवी फ़ायदा न पहुंचेगा यानी सवाब से महरूम रहेगा। *बाअ्ज़ नादान बीमारी में निहायत बेजा कलिमात बोल उठते हैं। और बाअ्ज़ खुदा ए तआला की जानिब ज़ुल्म की निस्बत कर के कुफ़्र तक पहुंच जाते हैं ये उनकी इन्तिहाई शक़ावत और दुनिया व आख़िरत की हलाकत का सबब है।*
📚अनवार उल हदीस, सफ़ा 177

✒✒मिन जानिब:- इल्म की रौशनी

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