Corona Virus Ke Sabab Namaz Panjgana Ki Jamaat Aur Tark E Jumma Ka Sharai Hukm

कोरोना वाइरस के सबब नमाज़ पन्जगाना की जमाअत और तर्क जुम्मा का शरई हुक्म!


*सवाल :-* क्या फ़रमाते हैं औलमा ए किराम व मुफ़्तीयाने एज़ाम मसअल् ज़ेल में कि आज मुल्क ए हिन्दुस्तान ही नहीं बल्कि पुरी दुनिया में कोरोना वाइरस एक वबा की शक्ल इख़्तियार कर चुकी है इस से हिफ़ाज़त के लिए हिन्दुस्तान के इलावा दुसरे ममालिक में भी लाॅक डाउन कर्फ़्यु नाफ़िज़ है और इस में आम लोगों को एक जगह जम्अ से रोका जा रहा है यहां तक कि मस्जिदों में नमाज़ पन्जगाना की जमाअत नमाज़ जुम्मा की अदाएगी पर सख़्त पाबंदी आइद कर दी गई है अगर इस ऐलान के ख़िलाफ़ अमल किया जाए तो इमाम व मोअज़िन और टरस्टीयां पर सख़्त क़ानूनी कारवाई की जाएगी। इस सुरत में नमाज़ पन्जगाना की जमाअत और जुम्मा की नमाज़ का क्या हुक्म है मस्जिद में अदा की जाए या अपने - अपने घरों में शरीअत का जो भी हुक्म हो बयान फरमाएं ❓❓

🔊गुलाम मुस्तफ़ा खान जकरिया (कोलकाता)

*जवाब :-* सवाल में हालात ए हाज़रा के पेशे नज़र आप ने नमाज़ ए पन्जगाना और नमाज़ जुम्मा की अदाएगी के बारे में पुछा है। इसलिए पहले हम नमाज़ ए पन्जगाना को मस्जिद में बा जमाअत अदा करने या ना करने का हुक्म तहरीर करेंगे फ़िर नमाज़ ए जुम्मा की अदाएगी का हुक्म बयान करेंगें। इन्शाअल्लाह
इसलिए कि जुम्मा की नमाज़ का हुक्म पन्जगाना नमाज़ की जमाअत के हुक्म से कुछ जुदा है।

*(1)*  हर मुस्लमान आक़ील, बालिग, आज़ाद, क़ादिर ए मर्द पर जमाअत वाजिब है
📚फ़तावा हिन्दीया, जिल्द 1, सफ़ा 82 पर है....

*"و فی الغایة قال عامة مشاںٔخنا انھا واجبة"*۔ 
इसी में है
*"و فی البداںٔع تجب علی الرجال العقلاء البالغین الاحرار القادرین علی الصلوٰۃ بالجماعة من غير حرج"*۔
۔
*बिला उज़रे शरयी एक वक़्त की जमाअत का तर्क गुनाह, तारिके गुनाहगार और कई बार तर्क करने वाला फ़ासिक मरदुदूश शहादा है*
फ़कीह ए आज़म ए हिन्दुस्तान हुज़ूर शदरुशरीअह् अलैहिर्रहमां तहरीर फ़रमाते हैं कि....
*आक़ील, बालीग, हर क़ादीर पर जमाअत वाजिब है बिला उज़र् एक बार भी छोडने वाला गुनहगार और मुसतहिके सजा है और कई बार तर्क करे तो मरदुदूश शहादा और उसको सख़्त सजा दी जाएगी।*
➡️लेकिन *कोरोना वाइरस* को लेकर जो सुरते हाल है वह किसी भी ज़ी फ़हम और साहिबे नज़र से मख़फ़ी नहीं। जिस किसी मुल्क में कोरोना वाइरस के सबब उस से हिफ़ाज़त के लिए लाॅक डाउन कर्फ़्यु नाफ़िज़ किया गया है और एक जगह चन्द लोगों के इजतिमा पर पाबंदी लगाई गई है। यहां तक कि मस्जिदों में नमाज़ ए पन्जगाना और नमाज़ ए जुम्मा की अदाएगी पर सख़्त रोक लगा दी गई है। और इसके ख़िलाफ़ वर्ज़ी करने वालों पर सख़्त क़ानूनी कारवाई करने की भी ताक़ीद की गई है। तो इस सुरत में मुस्लमान मज़बुर और बेबस है। और माअज़ुर मह्ज़ है। और माअज़ुर पर जमाअत वाजिब नहीं।
📚 फ़तावा आलमगिरी, जिल्द 1, सफ़ा 83 पर है

*"و تسقط الجماعة بالاعذار"*۔

और
📚 बहार ए शरीअत, जिल्द 3, सफ़ा 584 पर है......
*शदीद कीचड का हाईल होना, सख़्त सर्दी, सख़्त तारिक़, आंधी, माल या खाने के लुत्फ़ होने का अनदेशा, कर्ज़ ख़्वाह का ख़ौफ़ है और ये तगं दस्त है, जालिम का ख़ौफ़ ये सब तर्के जमाअत के लिए उज़्र हैं।*

सूरते हाल में हुकूमत की तरफ से जितने लोगों को मस्जिद में नमाज़े बाजमाअत अदा करने की इजाज़त दी गयी है उतने लोग मस्जिद में बाजमाअत नमाज़ अदा करें , बाकी लोग अपने अपने घरों में नमाज़ पढ़ें। अगर जमाअत मयस्सर हो तो जमाअत से पढ़ें वरना तन्हा तन्हा पढ़ लें, तर्के जमाअत का गुनाह न होगा।

क़ुरआन मजीद में है:-
 لا یکلف الله نفسا إلا وسعها۔ 

वल्लाहु तआला आलम....

*(2)* जुम्मा की फ़र्ज़ीयत और उसकी जमाअत नमाज़े पंजगाना कि फ़र्ज़ीयत और जमाअत से ज़्यादा अहमियत का हामिल है।
📚दुर्रे मुख्तार, जिल्द 2, सफ़ा 19 पर है
*"ھی فرض عین یکفر جاحدھا ۔۔۔۔وھی فرض مستقل آکد من الظھر"*۔

फ़क़ीह ए आज़म ए हिंदुस्तान अल्लामा अमजद रज़ा क़ादरी رحمۃ اللہ علیہ तहरीर फ़रमाते हैं कि :- *जुम्मा फ़र्ज़ है और उसकी फ़र्ज़ीयत ज़ोहर से ज़्यादा मोअक़ीदा है*
📚बहार ए शरीअत, हिस्सा 3, सफ़ा 762

मगर जुम्मा हर जगह सही नहीं और न हर किसी पर वाज़िब बल्कि सेहत ए जुम्मा और वजुबे जुम्मा के लिए कुछ शराइत हैं जिसकी तफ़सील क़ुतुब ए फ़िक़्ह व फ़तावा में मजकूर हैं।
यहाँ पर हम सिर्फ इस हुक्म ए शराअ् को बयान करते हैं जो हालाते हाजरा के तनाज़ुल में किया गया है:- 
1. सेहते जुम्मा शराइत में से एक शर्त है इमाम माजून का होना। यानी हाकिम ए इस्लाम या क़ाज़ी ए शराअ् या उसके नाइब ने जिसको जुम्मा क़ाइम करने की इजाज़त दी हो।
📚फ़तावा हिंदिया, जिल्द 1, सफ़ा 145 पर है 

*"حتیٰ لا تجوز اقامتھا بغیر امر السلطان او امر ناںٔبه کذا فی محیط السرخسی"* ۔

2. अज़ान ए आम का होना यानी मस्जिद का दरवाज़ा खोल दिया जाए ताकि जिस मुसलमान का जी चाहे बिला रोक टोक आ सके।
📚फ़तावा हिंदिया, जिल्द 1, सफ़ा 148 पर है

*"و منھا الاذن العام و ھو ان تفتح ابواب الجامع فیؤذن للناس کافة حتى ان جماعة لو اجتمعوا فى الجامع و اغلقوا ابواب المسجد على انفسهم و جمعوا لم يجز"*۔  

3.जुम्मा वाजिब होने के ग्यारह(11) शर्ते हैं उनमें से एक अहम शर्त बादशाह या चोर का ख़ौफ़ ना होना भी है ।
जैसा कि 
📚रद्दुल मुहतार में है

*"و عدم خوف ای من السلطان او لص"*۔

और 
📚फ़तावा आलमगीरी, जिल्द 1, सफ़ा 144 पर है

*"والمطر الشدید والاختفاء من السلطان الظالم مسقط کذا فی فتح القدیر"*۔

मजकूर बाला इबारात फ़क़ीहा से चंद बातें मालूम हुई, पहली बात ये की जुम्मा हर कोई क़ाइम नहीं कर सकता या तो हाकिम ए इस्लाम या क़ाज़ी ए शराअ् या उसका नाइब या फिर वो जिसको इन तीनों में से किसी एक कि इज़ाज़त हासिल हो, वही क़ायम कर सकता है।
जबकि नमाज़ ए पंजगाना की इमामत व जमाअत में ये शर्त नहीं बल्कि हर सही ख़्वा आलिम हाफिज व क़ारी इसकी इमाम व जमाअत कर सकता है।
दूसरी बात ये की जुम्मा की नमाज़ हर जगह अदा नहीं कि जा सकती है, बल्कि उसके लिए ऐसी जगह चाहिए जहां आम मुसलमानों को बिला किसी रोक टोक के आने की इजाज़त हासिल हो और ये बात घरों, फ्लाइटो, और बिल्डिंगों में मुकम्मल तौर से नहीं पाई जाती हैं ।
लिहाजा इन मक़ामात पर नमाज़े जुम्मा की अदाएगी दुरुस्त नहीं।
तीसरी बात ये की मुसल्ली को हाकिम या चोर वगैरह का खौफ़ ना हो।
1️⃣ *सूरते मोसूला में इनसब तवज्जिहात के बाद आपका जवाब ये है कि जब कोरोना वायरस को लेकर हुकूमत लोगों की इस्तेमा से मना है यहां तक कि इबादतगाहों ख़्वाह मस्जिद हो कि मंदिर व गिरजाघर की हाजरी पर भी सख़्त पाबंदी है, हत्ता की ये भी देखा गया है कि मस्जिद से नमाज़ पढ़ कर बाहर निकलने वालों को पुलिस बहुत बुरी तरह पिट रही है।*
*नीज़ शहर लखनऊ के इमाम व मुअज़्ज़िन और ट्रस्टीयान पर भी FIR दर्ज की जाने की खबर मोअसुल हुई है। इसलिए इस सूरत में मुसलमान मजबूर और माजूर महज़ है इसपर जुम्मा वाजिब नहीं।*
*जैसा कि हवाला ऊपर गुजरा लिहाज गवर्मेंट जितने लोगों को मस्जिद में जुम्मा की नमाज़ के लिए शिरक़त की इजाज़त देती है उतने ही लोग मस्जिद में हाजिर होकर नमाज़े जुम्मा अदा करें बाकी लोग मस्जिद में नमाज़े जुम्मा हो जाने के बाद अपने अपने घरों में ज़ोहर की नमाज़ तन्हा तन्हा पढ़ लें, नमाज़े जुम्मा छोड़ने का गुनाह न होगा।*
*शहर में जुम्मा के दिन ज़ोहर की जमाअत जाइज़ नहीं इसलिए तन्हा तन्हा ही पढ़ें जमाअत न करें बकिया दूसरे अवक़ात की नमाज़ें जमाअत से अदा कर सकते हैं अगर मयस्सर हो।*
📚हदाया जिल्द 1, सफ़ा 150 पर है 
*ویکرہ ان یصلی المعذورون الظھر بجماعة يوم الجمعة فى المصر"*

ये हुक्म शहर वालों के लिए है ।

🔴नोट:- *इस बात का ख़्याल रहे ही जुम्मा की जमाअत में इमाम के अलावा कम अज़ कम तीन(3) लोग हों और मस्जिद के दरवाज़े खुले रहें।*

2️⃣ *देहात वालों के लिए हुक्म ये है कि तन्हा तन्हा या जमाअत जो सूरत मुमकिन हो पढ़ें।*

3️⃣ घरों, फ्लाइटो और बिल्डिंगो में जुम्मा की नमाज़ नहीं हो सकती कि शरायते जुम्मा मुकम्मल तौर से इन मक़ामात पर नहीं पाए जाते।

✍️✍️कुतुब:- मुफ़्ती रिज़वान अहमद मिस्बाही, रामगढ़(झारखण्ड)

✒✒मिन जानिब:-रज़वी दारुल इफ्ता
🖊️🖊️ इल्म की रौशनी

Corona Virus Ke Sabab Namaz Panjgana Ki Jamaat Aur Tark E Jumma Ka Sharai Hukm

Razvi Daarul Ifta 

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