दावत क़बुल करना कैसा??
➡ *दावत क़बुल करना सुन्नत है*। बाअज़ औलमा के नज़दीक दावत क़बुल करना *वाजिब* है। दोनों क़ौल हैं, बज़ाहिर ये मालूम होता है कि
इजाबत सुन्नत ए मौकिदा है ।
*वलीमा* के सिवा दूसरी दावतों में भी जाना *अफज़ल* है।
📚बहारे शरीअत जिल्द - 2, हिस्सा - 16, सफ़ा - 32
📚क़रीना ए ज़िन्दगी - सफ़ा 83
1⃣ *हदीस शरीफ़*:- हज़रत ए
अब्दुल्लाह बिन उमर रदि अल्लाहु तआला अन्हुमा से रिवायत है कि *रसूलुल्लाह ﷺ ने इरशाद फरमाया*
"जब तुम मे से किसी को वलीमा खाने के लिए बुलाया जाए तो वह जरूर जाए"
📚बुख़ारी शरीफ़ - जिल्द 3, हिस्सा 102,सफ़ा 87
📚मुस्लिम शरीफ़ - जिल्द 1, सफ़ा 462
📚क़रीना ए ज़िन्दगी - सफ़ा 83-84
2⃣ *हदिस शरीफ़* :- हजरत ए अबु हुरैरा रदि अल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है कि *रसूलुल्लाह ﷺ* ने इरशाद फरमाया
"जो दावत कबुल करके न जाए उसने अल्लाह तआला और उसके रसुल की नाफरमानी की"
📚बुख़ारी शरीफ़ - जिल्द 2, हिस्सा 102, सफ़ा 88
📚क़रीना ए ज़िन्दगी - सफ़ा 84
3⃣ *हदिस शरीफ़*:-हजरत ए हमीद बिन अब्दुर्रहमान हुमेरी रदि अल्लाहु तआला अन्हु से रिवायत है कि *रसूलुल्लाह ﷺ* ने इरशाद फरमाया
"जब दो शख़्स दावत देने बय्क (एक वक्त आए) तो जिसका घर तुम्हारे घर से क़रीब हो उसकी दावत क़बुल करो, और अगर एक पहले आया तो जो पहले आया उसकी दावत क़बुल करो "
📚इमाम अहमद, अबु दाऊद शरीफ़ - जिल्द 3, हिस्सा 136, हदिस 357, सफ़ा 134
📚क़रीना ए ज़िन्दगी - सफ़ा 84
✒✒मिन जानिब :- मेम्बरान इल्म की रौशनी
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