Hadde Shara Se Kam Dadhi Rakhne Wale Ki Iqtada Mein Namaz E Panjgana, Namaz E Janaza Ya Namaz E Taraweeh Padhna Kaisa? Nij Aise Sakhs Ko Imamat Ke Liye Bulane Wale Par Kya Hukm E shara Aaid Hota Hai.

हद्दे शरअ से कम दाढ़ी रखने वाले की इक़्तदा में नमाज़ ए पंजगाना, नमाज़ ए जनाज़ा या नमाज़ ए तरावीह पढ़ना कैसा ? निज़ ऐसे शख़्स को इमामत के लिए बुलाने वाले पर क्या हुक्म ए शरअ आइद होता है 


➡️ जिनकी दाढ़ी एक मुश्त से कम हो उनके पीछे नमाज़ ए जनाज़ा या नमाज़ ए तरावीह पढ़ना कैसा है? और अगर जायज़ नहीं है तो जो उनको यह जानते हुए बुलाते हैं कि ये दाढ़ी काटते हैं तो उन पर शरीअत का क्या हुक्म है? 
या जो साल के अक्सर हिस्सों में दाढ़ी नहीं रखते हैं या रखते हैं तो हद्दे शरअ से कम रखते हैं और रमज़ान के आते ही वह दाढ़ी रखने लगते हैं तो
ऐसे हालात में जमाअत से नमाज़ अदा की जाएगी या तन्हा ? 

 ➡️ *ज़वाब :-*
औलमाए जमहुर का इस बात पर इत्तेफ़ाक है कि दाढ़ी हद्दे शरअ से कम रखने वाला फ़ासिक़ है ख़्वाह वह काट कर कम करे या मुंड कर, बहर सूरत फ़ासिक़ है। पहले हम फ़ासिक़ की तारीफ़ करते हैं, फ़िर दाढ़ी की शरअई हद व मिक़दार रक़म करेंगे इसके बाद उसका हुक्म बयान करने कि सआदत हासिल करेंगे। انشاء اللہ - ताकि आसानी के साथ मसला समझ में आ जाए :-

*फ़ासिक़ की तारीफ़*:- लोग़त में फ़ासिक़ की तारीफ़ ये है
*الفاسق خارج عن طریق الحق والصلاح*

*यानी जो शख़्स हक़ व सुलह के रास्ते से निकल जाए वह फ़ासिक़ है।*

अल्लामा राग़िब अस्फ़हानी तहरीर फरमाते हैं,
 *فسق فلان : خرج عن حجر الشرع* ۔

*तर्जुमा :- फ़लां फ़ासिक़ हो गया यानी शरीअत के रास्ते से मूनहरिफ़ हो गया।*
और
*इसतलाहे शरअ में फ़ासिक़ उस शख़्स को कहते हैं जो हराम का मूरतकब हो या वाजिब को तर्क करे या अताअते ख़ुदावन्दी से बेज़ारी करे। बलफ़्ज़ दीगर यूँ कह लिया जाए जो गुनाहे कबीरा का मूरतकब हो या गुनाहे सगिरह पर मस्र हो वह फ़ासिक़ है।*

*"واصطلاحاً فسق عن طاعة ربه إذ خرج عنها. هو من كل فعل حراما أو ترك واجبا، فهو غير العادل. فمعنى الفسق فى المصطلح الشرعى هو خروج الإنسان عن حدود الشرع وانتهاك قوانينه بالسيىٔات وارتکاب المحرمات وھی الکبائر اوالاصرار علی الصغاںٔر"*۔

और क़वायदुल फ़िक़्ह, जिल्द 1, सफ़ा 412 पर है :-

*وفی الشرع ارتکاب المسلم کبیرة قصدا او صغيرة مع الاصرار عليها بلا تأويل*

*दाढ़ी की शरअई हद :-* दाढ़ी एक मुश्त रखना वाजिब उससे कम करना हराम है। अल्लामा अब्दुल हक़ मोहद्दीस देहलवी علیہ الرحمہ फ़रमाते हैं :-

*"لحیہ حلق کردن حرام است۔۔۔۔۔۔۔۔۔آں بقدر قبضہ واجب است"*
यानी दाढ़ी मुडना हराम है और एक मुश्त रखना वाजिब है।  📚 ١/٢١٢   اشعۃ المعات   

दुर्रे मुख़्तार में है :-
*"یحرم علی الرجل قطع لحیته"*
*यानी मर्द को दाढ़ी काटना हराम है।*
हुज़ूर सरकार ए आला हज़रत علیہ الرحمتہ و الرضوان तहरीर फरमाते हैं कि :-

 *दाढ़ी कतराना मुंडाना हराम है।*
📚 फ़तावा रज़वीया, जिल्द 3, सफ़ा 372

और हुज़ूर सदरुश्शरीया علیہ الرحمہ रक़म तराज़ हैं कि *दाढ़ी बढ़ाना सुनने अंबिया साबेकिन से है, मुंडाना या एक मुश्त से कम रखना हराम है।*

📚 बहार ए शरीअत, हिस्सा 16, सफ़ा 197 

मुफ़्ती अब्दुल क़य्युम हज़ारवी से दाढ़ी के मुतअल्लिक़ एक सवाल किया गया कि दाढ़ी कितनी होनी चाहिए बहुत से आलिम कहते हैं कि एक मुश्त रखो ठुढ़ी के नीचे से शुरू करो, बाज़ कहते हैं कि होंठ के नीचे से एक मुश्त रखो, बाज़ कहते हैं कि दूर से नज़र आनी चाहिए इतनी रखो, बाज़ कहते हैं कि जितनी नीचे जाए जाने दो काटना हराम है, शरीअत में इसका क्या हुक्म है?
मैंने सुना है कि दाढ़ी को माफ़ी दो इससे क्या मुराद है?
आप ज़वाब तहरीर करते हैं :-
 *दाढ़ी मुश्त भर रखना सुन्नत ए मुअक़दा क़रीब उल वाजिब है इससे ज़ायद में इख़्तियार है रखे या न रखें, दाढ़ी बावक़ार और ख़ूबसूरत हो उस सूरत में मुश्त भर से बढ़ाने की आप को इजाज़त है, सुन्नत व वाजिब नहीं है। अगर ज़्यादा बड़ी अच्छी न लगे तो काट दें ताकि उसके मुतअल्लिक़ कोई घटिया तस्उर न करे और बे अदबी न हो।*
📚 दाढ़ी की शरअइ हैसियत सवाल नंबर 778

 اتحاد السادۃ المتقین میں ہے :-

*"لا یجوز حلقھا ولا نتفعھا ولا قص الکثیر منھا"*

*यानी दाढ़ी का न मुंडना जायज़ है न चुनना न ज़्यादा कतरना।*

और ख़शख़शी दाढ़ी के  मुतअल्लिक़ मुजदिद ए दीनो मिल्लत हुज़ूर सरकार ए आला हज़रत  علیہ الرحمتہ و الرضوان  तहरीर फ़रमाते हैं कि :-

*उनमें दो बाक़रार ख़ुद दाढ़ी ख़शख़ाश कराते हैं और ये फ़िसक़ और फ़ासिक़ की शहादत मक़बूल नहीं।*

📚 फ़तावा रज़वीया, जिल्द 18, सफ़ा 126

यहां पर मैं एक बात अर्ज़ करता चलूं कि बाज़ औलमा का मोअकिफ़ ये है कि दाढ़ी रखना वाजिब है मग़र एक मुश्त रखना वाजिब नहीं बल्कि सुन्नत है, और एक मुश्त से कम दाढ़ी रखने वाला तारिके सुन्नत है फ़ासिक़ नहीं।
(इस पर मुकम्मल बहस अल्लामा ग़ुलाम रसूल सइदी साहब ने अपनी क़िताब शरह सही मुस्लिम जिल्द 2 और 6 में की है तफ़सिल के लिए असल क़िताब की तरफ़ मराजिमत करें)

*"लेकिन मसलके आला हज़रत ये है कि दाढ़ी एक मुश्त रखना वाजिब है, उससे कम करना हराम है और फ़ेले हराम का मूरतकब फ़ासिक़ है और फ़ासिक़ की इक़्तदा में नमाज़ जायज़ नहीं।*

अक्सर औलमा ए कराम رحمہم اللہ تعالٰی علیہم اجمعین का अम्ल और फ़तवा मसलके आला हज़रत पर ही है। लिहाज़ा सूरते मोसुला में जो शख़्स दाढ़ी हद्दे शरअ से कम (यानी एक मुश्त से कम रखता है) ख़्वाह वह मुंड कर कम करे या चुन कर या काट कर अक्सर औलमा व फ़ुक़्हा के नज़दीक फ़ासिक़ है। उसकी इक़्तदा में नमाज़ अदा करना जायज़ नहीं। 
मुहक़ीक़े अस्र ताजुल फ़ुक़्हा मुफ़्ती अख़्तर हुसैन क़ादरी जमदा शाही इसी तरह के एक सवाल के जवाब में रक़म तराज़ हैं :-
*ज़ैद दाढ़ी एक मुश्त से कम कराने की बिना पर हराम कार और सख़्त मुज़रिम व गुनाहगार व फ़ासिक़ ए मुअलिन है। उसे इमाम बनाना गुनाह और उस की इक़्तदा में नमाज़ नाजायज़ है। अगर पढ़ ली है तो दोहराना वाज़िब है।*

📚 फ़तावा अलमिया, जिल्द 1, सफ़ा 197

इसी में फ़तावा रज़वीया के हवाला से मरकुम है :-

*अगर फ़ासिक़ ए मोअलिन है कि ऐलानिया कबीरा का इरतकाब या सगिरह पर असरार करता है तो उसे इमाम बनाना गुनाह और इसके पीछे नमाज़ मकरुहे तहरीमि है। उसके पीछे नमाज़ पढ़नी गुनाह और पढ़ ली तो फ़ेरनी वाज़िब।*
📚 फ़तावा रज़वीया, जिल्द 3, सफ़ा 353

और जो जानबुझ कर ऐसे लोगों को इमामत के लिए बाहाल करते हैं वो सख़्त गुनहगार, मूसतहिक़ अजाबे नार, ग़ज़बे जब्बार व क़ह्हार में गिरफ्तार हैं।

*"غنیہ  ص٥١٣پرہے ،، لو قدموا فاسقا یاثمون"*۔

तम्बीह :- अक्सर मुनतरजमीन रमज़ान उल मुबारक में तरावीह के लिए ऐसे हाफ़िज़ का इंतेख़ाब कर लेते हैं जो साल भर दाढ़ी नहीं रखते, माह ए रमज़ान से दो तीन महिना पहले दाढ़ी छोड़ देते हैं या रखते हैं तो हद्दे शरअ से कम रखते हैं, ख़बरदार ऐसे लोगों को हरगिज़- हरगिज़ इमामत के ओहदा पर फ़ाइज़ न करें उन की इक़्तदा में नमाज़ जायज़ नहीं होती है, लिहाजा एहतराज़ लाज़िम है, वरना सारा वबाल आप के सर आएगा।

واللہ تعالیٰ اعلم بالصواب۔

✍🏻 कतबः  __ मुफ़्ती मुहम्मद रिज़वान अहमद मिस्बाही, रामगढ़ (झारखंड)
📱9576545941

✒️✒️मिन जानिब :- रज़वी दारुल इफ़्ता व

✒️✒️ इल्म की रौशनी

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Hadde Shara Se Kam Dadhi Rakhne Wale Ki Iqtada Mein Namaz E Panjgana, Namaz E Janaza Ya Namaz E Taraweeh Padhna Kaisa? Nij Aise Sakhs Ko Imamat Ke Liye Bulane Wale Par Kya Hukm E shara Aaid Hota Hai.

Razvi Daarul Ifta

Mufti Rizwan Ahmad Misbahi 

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