क्या एक ही शब दो जगह तरावीह की इमामत दुरुस्त है?
क्या फ़रमाते हैं औलमा ए दीन और मुफ़्तीयाने शरअ मतीन इस मसला में कि जै़द एक मस्जिद का इमाम है वह अपनी मस्जिद में तरावीह पढ़ाने के बाद उसी दिन मुहल्ले के किसी फ्लैट में सिर्फ़ तरावीह पढ़ा सकता है या नहीं? जबकि दोनों जगह मुकम्मल क़ुरआन का इरादा हो। बराए मेहरबानी रहनुमाई फरमाए।
*जवाब:-*
एक शख़्स मुकम्मल तरावीह की इमामत एक ही रात दो मस्जिदों (दो जगहों) में नहीं कर सकता कि सहीह् मज़हब पर यह जायज़ नहीं।
फ़तावा आलमगिरी में है!
*الامام یصلی التراویح فی مسجدین کل مسجد علی وجه الكمال لا يجوز کذا فی محیط السرخسی والفتوی علی ذالک کذا فی المضمرات*
*तर्जमा :* एक इमाम दो मस्जिदों में मुकम्मल तौर पर (पूरी) तरावीह पढ़ाए यह जायज़ नहीं। ऐसा ही मुहीत सरख़सी में है, और उसी पर फ़तवा है, ऐसा ही मज़मिरात में है।
📚फ़तावा आलमगिरी, जिल्द 1, सफ़ा 116
और जोहरनिरह में है!
*لو صلی امام التراویح فی مسجدین فی کل مسجد علی وجه الكمال قال ابو بكر الاسكاف لا يجوز و قال ابو نصر يجوز لأهل المسجدين و اختار ابوالليث قول الاسكاف و هو الصحيح*
*तर्जमा :-* अगर कोई इमाम दो मस्जिदों में मुकम्मल तौर पर (पूरी) तरावीह पढ़ाए तो शैख़ अबु बकर असकाफ़ ने फ़रमाया ये जायज़ नहीं और शैख़ अबु नस्र ने फ़रमाया दोनों मस्जिद वालों के लिए जायज़ है, शैख़ अबुललैस ने असकाफ़ के क़ौल को इख़्तियार किया और यही सही है।
📚 जोहरनिरह, जिल्द 1, सफ़ा 118
निज़ फ़तावा हिन्दीया में यह भी मरक़ूम है!
*لو صلی التراویح مقتدیا بمن یصلی مکتوبة أو وترا و نافلة الاصح أنه لا يصح الاقتداء به لانه مكروه و مخالف لعمل السلف*
*तर्जमा :-* अगर किसी ने नमाज़ ए तरावीह ऐसे शख़्स की इक़्तदा में अदा की जो फ़र्ज़ या वित्र या नफ़्ल पढ़ा रहा था तो यह इक़्तदा दुरुस्त नहीं क्योंकि यह मकरुह और तरीक़ा ए असलाफ़ के मुख़ालिफ़ है।
📚 फ़तावा आलमगिरी, जिल्द 1, सफ़ा 117
और मुजदीदे दीन व मिल्लत हुज़ूर सरकार ए आला हज़रत علیہ الرحمتہ و الرضوان तहरीर फ़रमाते हैं कि!
*अगर बिलफ़र्ज़ कोई शख़्स आज अपनी तरावीह पढ़ कर आज ही रात और लोगों की इमामत तरावीह में करे और क़ुरआन ए अज़ीम सुनाए तो यह नहीं कह सकते कि इस क़ुरआन सुनने का सवाब न होगा। रिवायत मुख़्तारह इमाम क़ाज़ी ख़ान पर तो ज़ाहिर है कि वह मुतनफ़्ल महज़ के पीछे तरावीह की इक़्तदा बेला कराहत जायज़ मानते हैं, सिर्फ़ इमाम के हक़ में कराहत कहते हैं अगर नियत इमामत करे वरना उस पर भी कराहत नहीं --------------*
*और रिवायत मुख़्तारह इमाम शम्सुलअइम्मा सरख़सी पर अगरचे यह नाजायज़ है और उन लोगों की तरावीह न होंगी, ،،لان التراویح سنة مستقلة شرعت بوجه مخصوص فلا تتأدى إلا به،، यानी क्योंकि नमाज़ ए तरावीह मुसतक़ील सुन्नत है जो वजह मख़सुस पर मशरुअ है तो ये इसी वजह मख़सुस के साथ ही अदा होगी और यही अस्ह है اھ ملخصا*
📚 फ़तावा रज़वीया मुतरजम, जिल्द 10, सफ़ा 606
واللہ تعالیٰ اعلم بالصواب۔
✍🏻 कतबः - - मुफ़्ती मुहम्मद रिज़वान अहमद मिस्बाही, रामगढ़ (झारखंड)
📱9576545941
✒️✒️मिन जानिब :- रज़वी दारूल इफ़्ता व
✒️✒️ इल्म की रौशनी
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Kya Ek Hi Shab Do Jagah Taraweeh Ki Imamat Durust Hai?
Razvi Daarul Ifta
Mufti Rizwan Ahmad Misbahi
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