लॉक डाउन कर्फ़्यु में हाफ़िज़ न मिले तो ग़ैरे हाफ़िज़ से तरावीह सुन सकते हैं या नहीं?
क्या फरमाते हैं औलमाए कराम मसला ए ज़ैल में कि अभी हमारे मुल्क के हालात साजगार नहीं हैं। एक वबा (कोरोना वायरस) की वजह से पूरा मुल्क लॉक डाउन कर्फ़्यु में फंस गया है। जो जहां था वहीं ठहर गया है। और इसी लॉक डाउन में माह ए रमज़ान उल मुबारक की आमद हो रही है। अब दरयाफ़्त करना यह है कि क्या ऐसी सूरत में तरावीह के लिए अगर हुफ़्फ़ाज़ न मिलें तो ग़ैरे हाफ़िज़ से तरावीह सुन सकते हैं या नहीं? या इसकी क्या सूरत होगी?
*ज़वाब :-*
नमाज़ ए तरावीह में एक बार पूरा क़ुरआन मजीद पढ़ना और सुनना सुन्नत मुअकिदा है। दो बार फज़ीलत और तीन बार अफ़ज़ल।
अल्लामा इब्ने आबेदिन शामी رحمۃ اللہ تعالٰی علیہ तहरीर फ़रमाते हैं!
*قوله!(والختم مرة سنة)اى قرأة الختم فى صلاة التراويح سنة وصححه فى الخانية وغيرها، و عزاه فى الهداية إلى أكثر المشائخ ، و فى الكافى إلى الجمهور ، و فى البرهان وهو المروى عن ابى حنيفة و المنقول فى الآثار* -
*तर्जमा :* नमाज़ ए तरावीह में एक बार पूरा क़ुरआन मजीद पढ़ना (सुनना) सुन्नत (मुअकिदा) है। ख़ानिया वगै़रह में इसी क़ौल को सही फ़रमाया। और हिदाया में अक्सर मशाइख़ की तरफ़ से अजीज़ कहा। और काफ़ी में औलमाए जमहुर की तरफ़ से अजीज़ कहा और बुरहान में है कि इमाम ए आज़म अबु हनीफा رضی اللہ تعالٰی عنہ से आसार में भी यही मनक़ुल व मरवी है-
📚 रद्दुल मोहतार, जिल्द 2, सफ़ा 497
और अल्लामा इब्ने नज़ीम رحمۃ اللہ تعالٰی علیہ तहरीर फ़रमाते हैं!
*فالمصحح فی المذھب ان الختم سنة*-
*तर्जमा :* सही मज़हब में क़ुरआन मजीद एक बार नमाज़ ए तरावीह में ख़त्म करना सुन्नत है-
📚बहरुल राइक़
और फ़तावा आलमगिरी में है!
*السنة فى التراويح إنما هو الختم مرة فلا يترك لكسل القوم كذا فى الكافى*-
*तर्जमा :* तरावीह में एक बार क़ुरआन मजीद ख़त्म करना सुन्नत है तो क़ौम की काहीली व सुस्ती की वजह से तर्क नहीं किया जाएगा।
📚फ़तावा आलमगिरी, जिल्द 1, सफ़ा 130
और मुजदिदे दीन व मिल्लत हुज़ूर सरकार आला हज़रत علیہ الرحمتہ و الرضوان तहरीर फ़रमाते हैं कि!
*तरावीह में पूरा कलामुल्लाह शरीफ पढ़ना और सुनना (सुन्नत) मुअकिदा है-*
और हुज़ूर सदरुश्शरिया علیہ الرحمہ तहरीर फ़रमाते हैं कि!
*तरावीह में एक बार क़ुरआन मजीद ख़त्म करना सुन्नत ए मुअकिदा है और दो मर्तबा फज़ीलत और तीन बार अफ़ज़ल लोगों की सुस्ती की वज़ह से ख़त्म को तर्क न करे।*
📚बहार ए शरीअत, हिस्सा 4, सफ़ा 33
और दुरे मुख़्तार में है!
*الختم مرة سنة و مرتين فضيلة و ثلاثا افضل ولا يترك الختم لكسل القوم*-
📚दुरे मुख़्तार अली रद्दुल मोहतार, जिल्द 2, सफ़ा 497
मज़कुरह बाला इबारतों से वाजेह हुआ कि तरावीह में एक बार पूरा क़ुरआन मजीद पढ़ना और सुनना सुन्नत मुअकिदा है और दो मर्तबा फ़ज़ीलत और तीन बार अफ़ज़ल।
*अब ज़ाहिर सी बात है कि तरावीह में पूरा क़ुरआन मजीद वही पढ़ सकता है जो हाफ़िज़ ए क़ुरआन है। और जो हाफ़िज़ ए क़ुरआन नहीं वो नहीं पढ़ सकता। जबकि तरावीह हर मुक्लिफ़ मर्द व ज़न, आलिम व जाहिल, हाफ़िज़ और ग़ैर हाफ़िज़ सब के लिए बालाजम्अ सुन्नत ए मुअकिदा है। तो क़ुरआन ए करीम पूरा याद न होने की वज़ह से तरावीह तर्क नहीं किया जा सकता कि बिला उज़्र शरई तर्क ए तरावीह जायज़ नहीं फ़िलेहाज़ा मातिसर मिनल क़ुरआन के तहत जो क़ुरआन की आयतें और सूरतें याद हैं उसी से तरावीह पढ़ा और सुना जाएगा।*(त)
इमाम अहल ए सुन्नत हुज़ूर सरकार आला हज़रत علیہ الرحمتہ و الرضوان से दरयाफ़्त किया गया कि!
*तरावीह में बाद सुरह फ़ातिहा सुरह एख़लास पढ़ना जायज़ है या मकरूह बावजूद ये कि इमाम और सुरह भी जानता है।*
आप जवाब में इर्शाद फ़रमाते हैं!
*जायज़ है बेला कराहत अगरचे सुरह फ़िल से आख़िर तक तकरार का तरीक़ा बेहतर है इस में रकात की गिनती याद रखनी नहीं पड़ती। रद्दुल मुख़्तार में है :- - "فی التجنیس و اختار بعضھم سورة الاخلاص فى كل ركعة و بعضهم سورة الفيل اى البداںٔة منها ثم يعيدها وهذا احسن لںٔلا یشتغل قلبه بعدد الركعات"- यानि तजनीस में है बाअज़ ने हर रकअत में सुरह एख़लास को मुख़्तार कहा और बाअज़ ने सुरह फ़िल को यानि इस से इब्तेदा हो और फ़िर तकरार किया जाए और यह सब से बेहतर है ताकि दिल तादाद ए रकाअत की तरफ़ मुतवजह न हो। और दुरे मुख़्तार में है :- " لا بأس ان یقرأ سورة و یعیدھا فی الثانیة" यानि इस में कोई हर्ज़ नहीं कि एक सूरत पढ़ी जाए और दूसरी रकअत में इसे दुबारा लौटाया जाए।*
📚 फ़तावा रज़वीया, जिल्द 7, सफ़ा 460
इस इबारत से मालूम हुआ कि जिसे सिर्फ़ एक सुरह याद हो वह भी तरावीह पढ़ा सकता है जबकि मिक़दार मायजुज़ बा सलात क़िराअत कर लेता हो और उस के अलावा दीगर कोई दूसरी वज़ह माना इमामत न हो।
واللہ تعالیٰ اعلم بالصواب۔
✍🏻 *कतबः -- मुफ़्ती मुहम्मद रिज़वान अहमद मिस्बाही रामगढ़*
📱9576545941
✒️✒️ *मिन जानिब :-* रज़वी दारूल इफ़्ता व
✒️✒️ इल्म की रौशनी
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