माहे सफर उल मुज़फ्फर की आख़री बुध (चहारशम्बह)का मसअला
➡माहे सफ़र का आख़री चहारशम्बह हिन्दुस्तान में बहुत मनाया जाता है। लोग अपने कारोबार बंद कर देते हैं। सैर व तफ़रीह व शिकार को जाते हैं। पूरियां पकती हैंं और नहाते धोते ख़ुशियाँ मनाते हैं और कहते हैं कि हुज़ूर अक़दस “ﷺ” ने इस रोज़ ग़ुसले सेहत फ़रमाया था और बिरुने मदीना तय्बह् सैर के लिए तशरीफ़ ले गए थे। ये सब बातें बे अस्ल हैं बल्कि इन दिनों में हुज़ूर “ﷺ” का मर्ज़ शिद्दत के साथ था। वह बातें ख़िलाफ़े वाक़्अये हैं और बाज़ लोग ये कहते हैं कि इस रोज़ बलाएं आती है और तरह - तरह की बातें बयान की जाती है। ये सब बे सुबूत हैं। बल्कि हदीस शरीफ़ का ये इरशाद है सफ़र कोई चीज़ नहीं। ऐसी तमाम ख़ुराफ़ात को रद करता है।
*ख़ुलासा ये है कि सफ़र के महीने के आख़िरी बुध की इस्लाम में कोई ख़ुसूसीयत नहीं।*
📚सहीह् बुख़ारी, जिल्द 4, सफ़ा 36, हदीस नम्बर 5757
📚फ़तावा रज़वीया, जिल्द 10, निस्फे अव्वल, सफ़ा 117
📚बहार ए शरीअत, जिल्द 3,हिस्सा 16, सफ़ा 659-660
📚ग़लतफहमियाँ और उनकी इस्लाह, सफ़ा 134
📚क़ानून ए शरीअत, हिस्सा 2, सफ़ा 415
✒✒मिन जानिब :- मेम्बरान इल्म की रौशनी
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Aakhri Budh Chaharsambah
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