महफ़िल ए मिलाद भी सिर्फ़ मुस्तहब
➡मिलाद शरीफ़ की महफ़िलें जो हमारे समाज का एक हिस्सा बन गई है, यह भी सिर्फ़ मुस्तहब की हद तक है। उन्हें बाइसे ख़ैर व बरकत कारे ख़ैर अच्छा और नेक काम हुज़ूर “ﷺ” से मुहब्बत का इज़हार सब कुछ कहा जा सकता है। लेकिन फ़र्ज़ व वाजिब या जिस अन्दाज़ से राइज है उस तरीक़े को सुन्नत भी नहीं कहा जा सकता है। और अगर कोई न भी करे लेकिन महफ़िले मिलाद की मज़ाक न बनाता हो उस को बुरा न जानता हो तो न कर के भी वह सुन्नी ही है। मेरा तजुर्बा है जो बदमज़हब होते हैं महफ़िले मिलाद सिर्फ़ न करने से उन्हें सैरी नहीं होती जब तक कि वह इस का मज़ाक़ न बनाएं, हंसी न उड़ाए और तक़रीरों में उस को नाजायज़ व ह़राम न कह लें। लेकिन उलमा ए अहले सुन्नत ने उसको फ़र्ज़ व वाजिब या सुन्नत तो नहीं फ़रमाया, लेकिन मुस्तहब ज़रूर लिखा है। आला हज़रत رضی اللہ تعالیٰ عنہ एक मक़ाम पर मिलाद शरीफ़ से मुतअल्लिक़ जाइज़ कामों का ज़िक्र कर के उस का हुक्म बयान फ़रमाते हैं
*बिला शुबह जाइज़ व मुस्तहब है।*
📚फ़तावा रज़वीया, जिल्द 26, सफ़ा 553
➡एक मर्तबा आला हज़रत رضی اللہ تعالیٰ عنہ गजं मुरादाबाद शरीफ़ आलिमे रब्बानी हज़रत मौलाना शाह फ़ज़लुर्रहमान साहिब गजं मुरादाबादी से मुलाक़ात के लिए तशरीफ़ लाए बात चीत में महफ़िले मिलाद शरीफ़ का ज़िक्र आया आला हज़रत ने इस बारे में उन की राय जनाना चाही उन्होंने फ़रमाया पहले आप बतायें तो आला हज़रत ने फ़रमाया
*मैं मुस्तहब जानता हूँ।*
📚हयात ए आला हज़रत, 1/477
यानी न फ़र्ज़ कहा न वाजिब न सुन्नत बल्कि सिर्फ़ मुस्तहब ही कहा, और हम लिख चुके हैं कि मुस्तहब वह है कि जिस के करने में सवाब हो लेकिन न करने में भी गुनाह व अज़ाब न हो।
📚बारहवीं शरीफ़ जलसे और जुलूस, सफ़ा 43,44
✍🏻✍🏻 मौलाना तत्हीर अह़मद रज़वी बरेलवी
✒✒मिन जानिब :- मेम्बरान इल्म की रौशनी
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