मसनुई और फ़र्ज़ी करबला जाना कैसा??
➡करबला इराक़ में उस जगह का नाम है जहाँ हज़रत इमाम आली मक़ाम अपने साथियों के साथ यज़ीदी फ़ौजों के हाथ शाहिद किये गए थे।अब जहाँ ताज़िये जमा और फिर दफन किये जाते हैं उन जगहों को लोग करबला कहने लगे ,मज़हब ए इस्लाम में इन फ़र्ज़ी करबलाओं की कोई हैसियत नहीं उन्हें मुक़द्दस मक़ाम ख़्याल करके उनका एहतेराम करना सब राफ़ज़ीयत और ज़हालत की पैदावार है।
आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा बरेलवी फरमाते हैं :- "अलम,ताज़िये,नहस
मेहन्दी, उनकी मन्नत गश्त चढ़ावा ,ढोल ताशे ,मजीरे, मरसिये, मातम,मसनुई करबला जाना ये सब बातें हराम व नाजायज़ व गुनाह है।"
📚फ़तावा रज़विया ,जिल्द 24 ,सफा 496 .
कुछ जगहों पर औरतें रात को चिराग लेकर करबला जाती हैं, और ख़्याल करती हैं कि जिसका चिराग जलता हुआ पहुंच गया उसकी मुराद पूरी हो गई ,ये सब जाहिलाना बातें हैं ऐसी वहम परस्ती की इस्लाम में कोई गुंजाइश नहीं है।
📚मुहर्रम में क्या जायज़ क्या नाजायज़ सफा 40.
✒मिन जानिब :- मेम्बरान इल्म की रौशनी
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