Mazar Par Chadar Chadhana Kab Jaiz Hai?

मज़ार पर चादर चढ़ाना कब जाइज़ है?


➡ *अल्लाह तआला के नेक और खास बंदे जिन्हें औलिया ए  किराम और बुज़ुर्गाने दीन कहा जाता है उनके विसाल के बाद उनकी मुकद्दस कब्रों पर चादर डाल देना जायज़ है और एक अच्छा काम है।*
इस चादर चढ़ाने में एक मसलिहत यह है कि इस तरह उनकी मुबारक कब्रों की पहचान हो जाती है कि यह किसी अल्लाह वाले की कब्र है और अल्लाह तआला के नेक बंदों की इज़्ज़त करना जिस तरह उनकी दुनियवी जिंदगी में जरूरी है उनके विसाल के बाद भी उनका अदब व एहतेराम ज़रूरी है और मज़ारात पर चादर चढ़ाना भी अदब व एहतेराम है और दूसरों से अलग उनकी पहचान बनाना है।
 जो लोग औलिया किराम के मज़ार पर चादर चढ़ाने को नाजायज़ व गुनाह कहते हैं वह ग़लती पर हैं । 

*लेकिन इस सिलसिले में मसअ्ला यह है कि एक चादर जो मज़ार पर चढ़ी हो जब तक वह पुरानी और खराब ना हो जाए दूसरी चादर ना डाली जाए* 
मगर आजकल अक्सर जगह मज़ारों पर उसके खिलाफ़ हो रहा है फटी पुरानी और खराब तो दूर की बात बात है मैली तक होने नहीं देते और दूसरी चादर डाल देते हैं। कुछ जगह तो दो चार मिनट भी चादर मज़ार पर रह नहीं पाती । इधर डाली और उधर उतरी यह ग़लत है और अहले सुन्नत के मज़हब के खिलाफ़ है । 

*इस तरह चादर चढ़ाने के बजाए उस चादर की क़ीमत से मोहताजों व मिस्कीनों को खाना खिलादें या कपड़ा पहना दे, या किसी गरीब मरीज़ का इलाज करा दे किसी ज़रूरतमंद का काम चला दे, किसी मस्जिद या मदरसे की ज़रुरत में ख़र्च कर दे, कहीं मस्जिद न हो वहां मस्जिद बनवा दे और इन सब कामो में उन्हीं बुज़ुर्ग के इसाले सवाब की नियत कर ले जिनके मज़ार पर चादर चढ़ाना थीं तो यह उस चादर चढ़ाने से बेहतर है।*
 हाँ अगर यह मालूम हो कि मज़ार पर चढ़ाई हुई चादर उतरने के बाद गरीबों मिस्कीनों और मुहताजों के काम में आती है तो मज़ार पर चादर चढ़ाने में भी कुछ हर्ज़ नहीं क्योंकि यह भी एक तरह का सदक़ा और खैरात है लेकिन आजकल शायद ही कोई ऐसा मज़ार होगा जिसकी चादरें गरीबों मिस्कीनों के काम में आती हो बल्कि मुजावरिन और सज्जादगान उन पर कब्ज़ा कर लेते हैं और यह सब अक्सर मालदार होते हैं।

तो ये चादरे चढ़ाना मालदारों को ही मालदार बनाना है।

ख़ुलासा

यह है कि आजकल मज़ारात पर एक चादर पड़ी हो तो वहां दूसरी चादर चढ़ाने के बजाए बुजुर्गों के इसाले सवाब के लिए सदका व खैरात  करना, गरीबों मिस्कीनों और मोहताजों के काम चलाना अच्छा है यही मजहबे अहले सुन्नत और उलमा ए अहले सुन्नत का फ़तवा है।*

✍️ *आला हज़रत इमामे अहले सुन्नत मौलाना अहमद रज़ा खां बरेलवी رحمۃ اللہ علیہ फ़रमाते हैं:*

*“और जब चादर मौजूद हो और वह पुरानी या खराब ना हुई कि बदलने की हाजत नहीं तो बेकार चादर चढ़ाना फुज़ुल है, बल्कि जो दाम इसमें सर्फ़ करें वली अल्लाह की रूहे  मुबारक हो यह इसाले सवाब के लिए मोहताज को दें । हाँ जहाँ मालूम हो की चढ़ाई हुई चादर जब हाजत से ज़ाएद हो खुद्दाम मसाकीन हाजतमन्द ले लेते हैं और इस नियत से डालें (मजाइक़ा नहीं) तो कोई बात नहीं की यह भी सदक़ा हो गया।”*

 📚अहकाम ए शरीअत, हिस्सा 1, सफ़ा 72

*और अगर ऐसी जगह जहां पहले से चादर मौजूद हो और वह पोसीदा और खराब ना हुई हो चादर चढ़ाने की मन्नत मानी हो तो उस मन्नत को पूरा करना जरूरी नहीं ।* 

आज कल लंबी लंबी चादरों को जुलूस के साथ उर्स के मौक़ा पर मज़ारों पर ले जाने का जो रिवाज़ चल पड़ा है ये भी बंद होना चाहिए, ख़्वाह उर्स की भीड़ में जुलूस के जरिये लोगों को परेशान करते हैं और रास्ते जाम करते हैं।

📚 ग़लत फ़हमियां और उनकी इस्लाह, सफ़ा 50-52

✒✒मिन जानिब:- मेम्बरान इल्म की रौशनी

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