Qurbani Ka Bayan, Masail Part 10

क़ुर्बानी का बयान, मसाइल

 (पार्ट 10)


2️⃣3️⃣ दसवीं (10) के बाद की दोनों रातें अय्यामें नहर में दाख़िल हैं उन में भी क़ुर्बानी हो सकती है मगर रात में ज़बह करना मकरुह है।

2️⃣4️⃣ पहला (1) दिन यानी दसवीं तारीख़ सब में अफज़ल है फ़िर ग्यारहवीं (11) और पिछला दिन यानी बारहवीं (12) सब में कम दर्जा है और अगर तारीख़ों में शक हो यानी तीस (30) का चाँद माना गया है और उनतीस (29) के होने का भी शुब्हा है मसलन गुमान था कि उनतीस (29) का चाँद होगा मगर अब्र (बादल) वग़ैरह की वजह से ना दिखा या शहादतें गुज़रें मगर किसी वजह से क़बुल ना हुए ऐसी हालत में दसवीं (10) के मुतल्लिक़ ये शुब्हा (शक) है कि शायद आज ग्यारहवीं (11) हो तो बेहतर ये है कि क़ुर्बानी को बारहवीं (12) तक मुअख़र ना करे यानी बारहवीं (12) से पहले कर डाले क्योंकि बारहवीं (12) के मुतल्लिक़ तेरहवीं (13) तारीख़ होने का शुब्हा होगा तो ये शुब्हा होगा कि वक़्त से बाद में हुई और इस सूरत में अगर बारहवीं (12) को क़ुर्बानी की जिस के मुतल्लिक़ तेरहवीं (13) होने का शुब्हा है तो बेहतर ये है कि सारा गोश्त सदक़ा कर डाले ब्लकि ज़बह की हुई बकरी और ज़िन्दा बकरी में क़ीमत का तफ़ाउत हो कि ज़िन्दा की क़ीमत कुछ ज़ायद  हो तो उस ज़्यादती को भी सदक़ा कर दे।

2️⃣5️⃣ अय्यामें नहर में क़ुर्बानी करना उतनी क़ीमत के सदक़ा करने से अफज़ल है क्योंकि क़ुर्बानी वाजिब है या सुन्नत और सदक़ा करना नफ़्ली इबादत है लिहाज़ा क़ुर्बानी अफज़ल हुई। और वजुब की सूरत में बग़ैर क़ुर्बानी किए वाजिब अदा नहीं हो सकता।

2️⃣6️⃣ शहर में क़ुर्बानी की जाए तो शर्त ये है कि नमाज़ हो चुके लिहाज़ा नमाज़ से पहले शहर में क़ुर्बानी नहीं हो सकती और देहात में चूंकि नमाज़ ए ईद नहीं है यहां तुलूअ फजर के बाद से ही क़ुर्बानी हो सकती है और देहात में बेहतर ये है कि बाद तुलूअ ए आफ़ताब क़ुर्बानी की जाए और शहर में बेहतर ये है कि ईद का ख़ुतबा हो चुकने के बाद क़ुर्बानी की जाए। यानी नमाज़ हो चुकी है और अभी ख़ुतबा नहीं हुआ है उस सूरत में क़ुर्बानी हो जाएगी मगर ऐसा करना मकरुह है।

2️⃣7️⃣ ये जो शहर व देहात का फर्क़ बताया गया ये मक़ामे क़ुर्बानी के लिहाज़ से है क़ुर्बानी करने वाले के एतबार से नहीं यानी देहात में क़ुर्बानी हो तो वो वक़्त है अगरचे क़ुर्बानी करने वाला शहर में हो तो नमाज़ के बाद हो अगरचे जिस की तरफ़ से क़ुर्बानी है वो देहात में हो लिहाज़ा शहरी आदमी अगर ये चाहता है कि सुबह ही नमाज़ से पहले क़ुर्बानी हो जाए तो जानवर देहात में भेज दे।

2️⃣8️⃣ अगर शहर में मुतअदद जगह ईद की नमाज़ होती हो तो पहली जगह नमाज़ हो चुकने के बाद क़ुर्बानी जायज़ है यानी ये ज़रूरी नहीं कि ईदगाह में नमाज़ हो जाए जब ही क़ुर्बानी की जाए ब्लकि किसी मस्जिद में हो गई और ईदगाह में ना हुई जब भी हो सकती है।

📚 बहार ए शरीअत, जिल्द 3, हिस्सा 15, सफ़ा 336 - 337

जारी है......

✒️✒️ मिन जानिब :- इल्म की रौशनी

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