Qurbani Ka Bayan, Masail Part 11

क़ुर्बानी का बयान, मसाइल

 (पार्ट 11)


2️⃣9️⃣ दसवीं (10) को अगर ईद की नमाज़ नहीं हुई तो क़ुर्बानी के लिए ये ज़रूरी है कि वक़्ते नमाज़ जाता रहे यानी ज़व्वाल का वक़्त आ जाए अब क़ुर्बानी हो सकती है और दूसरे या तीसरे दिन नमाज़ ए ईद से क़बल हो सकती है।

3️⃣0️⃣ मिना में चुंकि ईद की नमाज़ नहीं होती लिहाज़ा वहाँ जो क़ुर्बानी करना चाहे तुलूअ ए फ़ज्र के बाद से कर सकता है उस के लिए वही हुक्म है जो देहात का है किसी शहर में अगर फ़ितना की वजह से नमाज़ ए ईद ना हो तो वहाँ दसवीं (10) की तुलूअ फ़ज्र के बाद क़ुर्बानी हो सकती है।

3️⃣1️⃣ इमाम अभी नमाज़ ही में है और किसी ने जानवर ज़बह कर लिया अगरचे इमाम क़अदह में हो और बक़दरे तशहुद बैठ चुका हो मगर अभी सलाम ना फ़ैरा हो  तो क़ुर्बानी नहीं हुई और अगर इमाम ने एक तरफ़ सलाम फ़ैर लिया है दूसरी तरफ़ बाक़ी था कि उसने ज़बह कर दिया क़ुर्बानी हो गई और बेहतर ये है कि ख़ुतबा से जब इमाम फ़ारिग़ हो जाए उस वक़्त क़ुर्बानी की जाए।

3️⃣2️⃣ इमाम ने नमाज़ पढ़ ली उसके बाद क़ुर्बानी हुई फ़िर मालूम हुआ कि इमाम ने बग़ैर वज़ू नमाज़ पढा़ दी तो नमाज़ का आइदह किया जाए क़ुर्बानी के आइदह की ज़रूरत नहीं।

3️⃣3️⃣ ये गुमान था कि आज अरफ़ा (9 वीं ज़िलहिज्ज) का दिन है और किसी ने ज़व्वाले आफ़ताब के बाद क़ुर्बानी कर ली फ़िर मालूम हुआ कि अरफ़ा का दिन न था बल्कि दसवीं (10) तारीख़ थी तो क़ुर्बानी जायज़ हो गई। यूँही अगर दसवीं (10) को नमाज़ ए ईद से पहले क़ुर्बानी कर ली फ़िर मालूम हुआ कि वो दसवीं (10) न थी बल्कि ग्यारहवीं (11) थी तो उसकी भी क़ुर्बानी जायज़ हो गई ।
 
3️⃣4️⃣ नौवीं (9) के मुतल्लिक़ कुछ लोगों ने गवाही दी कि दसवीं (10) है इस बेना पर उसी रोज़ नमाज़ पढ़ कर क़ुर्बानी की फ़िर हुआ कि गवाही ग़लत थी वो नौवीं (9) तारीख़ थी तो नमाज़ भी हो गई और क़ुर्बानी भी।

📚 बहार ए शरीअत, जिल्द 3, हिस्सा 15, सफ़ा 337 - 338

जारी है......

✒️✒️ मिन जानिब :- इल्म की रौशनी

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