क़ुर्बानी का बयान, मसाइल
(पार्ट 6)
1️⃣ मुसाफ़िर पर क़ुर्बानी वाजिब नहीं अगर मुसाफ़िर ने क़ुर्बानी की ये नफ़्ल है और फ़क़ीर ने अगर ना मन्नत मानी हो ना क़ुर्बानी की नियत से जानवर ख़रीदा हो उस का क़ुर्बानी करना भी नफ़्ल है।
2️⃣ बकरी का मालिक था और उस की क़ुर्बानी की नियत कर ली या ख़रीदने के वक़्त क़ुर्बानी की नियत ना थी बाद में नियत कर ली तो इस नियत से क़ुर्बानी वाजिब नहीं होगी।
3️⃣ क़ुर्बानी वाजिब होने के शराइत ये हैं :-
1. इस्लाम :- यानी ग़ैर मुस्लिम पर क़ुर्बानी वाजिब नहीं।
2. इक़ामत :- यानी मुक़ीम होना, मुसाफ़िर पर वाजिब नहीं।
3. तवन्गरी :- यानी मालिक ए निसाब होना यहां मालदारी से मुराद वही है जिस से सदक़ा व फ़ित्र वाजिब होता है, वो मुराद नहीं जिस से ज़कात वाजिब होती है।
4. हुरियत :- यानी आज़ाद होना जो आज़ाद ना हो उस पर क़ुर्बानी वाजिब नहीं कि ग़ुलाम के पास माल ही नहीं लिहाज़ा इबादते मालिया उस पर वाजिब नहीं। मर्द होना इस के लिए शर्त नहीं। औरतों पर वाजिब होती है जिस तरह मर्दों पर वाजिब होती है, इस के लिए बुलूग़ (बालिग़ होना) शर्त है या नहीं इस में इख़्तिलाफ़ है और नाबालिग़ पर वाजिब है तो आया ख़ुद उस के माल से क़ुर्बानी की जाएगी या उस का बाप अपने माल से क़ुर्बानी करेगा।
ظاھِرُ الرِّوَاية
ये है कि ना ख़ुद नाबालिग़ पर वाजिब है और ना उस की तरफ़ से उस के बाप पर वाजिब है और इसी पर फ़तवा है।
4️⃣ मुसाफ़िर पर अगरचे वाजिब नहीं मगर नफ़्ल के तौर पर करे तो कर सकता है सवाब पाएगा। हज करने वाले जो मुसाफ़िर हों उन पर क़ुर्बानी वाजिब नहीं और मुक़ीम हों तो वाजिब है जैसा कि मक्का के रहने वाले हज करें तो चूंकि ये मुसाफ़िर नहीं उन पर वाजिब होगी।
📚 बहार ए शरीअत, जिल्द 3, हिस्सा 15, सफ़ा 332
जारी है.......
✒️✒️ मिन जानिब :- इल्म की रौशनी
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Part 6
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