क़ुर्बानी का बयान, मसाइल
(पार्ट 7)
5️⃣ शराइत का पूरे वक़्त में पाया जाना ज़रूरी नहीं बल्कि क़ुर्बानी के लिए जो वक़्त मुक़र्रर है उस के किसी हिस्सा में शराइत का पाया जाना वजुब के लिए काफ़ी है मसलन एक शख़्स इब्तेदाए वक़्त क़ुर्बानी में काफ़िर था फ़िर मुसलमान हो गया और अभी क़ुर्बानी का वक़्त बाक़ी है उस पर क़ुर्बानी वाजिब है जबकि दुसरे शराइत भी पाए जाएं उसी तरह अगर ग़ुलाम था और आज़ाद हो गया उसके लिए भी यही हुक्म है। यूँही अव्वल वक़्त में मुसाफ़िर था और असनाए वक़्त में मुक़ीम हो गया उस पर भी क़ुर्बानी वाजिब हो गई या फ़क़ीर था और वक़्त के अन्दर मालदार हो गया उस पर भी क़ुर्बानी वाजिब है।
6️⃣ क़ुर्बानी वाजिब होने का सबब वक़्त है जब वो वक़्त आया और शराइते वजुब पाए गए क़ुर्बानी वाजिब हो गई और उसका रुक्न उन मख़सूस जानवरों में किसी को क़ुर्बानी की नियत से ज़बह करना है। क़ुर्बानी की नियत से दुसरे जानवर मसलन मुर्ग़ को ज़बह करना नाजायज़ है।
7️⃣ जो शख़्स दो सौ (200) दिरहम या बीस (20) दिनार का मालिक हो या हाजत के सिवा किसी ऐसी चीज़ का मालिक हो जिसकी क़ीमत दो सौ (200) दिरहम हो वो ग़नी है उस पर कुर्बानी वाजिब है। हाजत से मुराद रहने का मकान और ख़ानादारी के सामान जिनकी हाजत हो और सवारी का जानवर और ख़ादिम और पहनने के कपड़े उनके सिवा जो चीज़ें हों वो हाजत से ज़ायद हैं।
8️⃣ उस शख़्स पर दीन है और उसके अमवाल से दीन की मिक़दार मुजरा (कटौती की जाए) की जाए तो निसाब नहीं बाक़ी रहती उस पर क़ुर्बानी वाजिब नहीं और अगर उसका माल यहाँ मौजूद नहीं है और अय्याम ए क़ुर्बानी (10,11,12 जिलहिज्जा) गुज़रने के बाद वो माल उसे वसूल होगा तो क़ुर्बानी वाजिब नहीं।
9️⃣ एक शख़्स के पास दो सौ (200) दिरहम थे साल पूरा हुआ और उनमें से पाँच (5) दिरहम ज़कात में दिए एक सौ पन्चानवे (195) बाक़ी रहे अब क़ुर्बानी का दिन आया तो क़ुर्बानी वाजिब है और अगर अपने ज़रूरियात में पाँच (5) दिरहम ख़र्च करता तो क़ुर्बानी वाजिब न होती।
🔟 मालिक ए निसाब ने क़ुर्बानी के लिए बकरी ख़रीदी थी वो गुम हो गई और उस शख़्स का माल निसाब से कम हो गया अब क़ुर्बानी का दिन आया तो उस पर ये ज़रूरी नहीं कि दुसरा जानवर ख़रीद कर क़ुर्बानी करे और अगर वो बकरी क़ुर्बानी ही के दिनों में मिल गई और ये शख़्स अब भी मालिक ए निसाब नहीं है तो उस पर उस बकरी की क़ुर्बानी वाजिब नहीं।
1️⃣1️⃣ औरत का महर शौहर के ज़िम्मे बाक़ी है और शौहर मालदार है तो उस महर की वजह से औरत को मालिक निसाब नहीं माना जाएगा अगरचे महर ए मुअज्जल हो और अगर औरत के पास इसके सिवा बक़दरे निसाब माल नहीं है तो औरत पर क़ुर्बानी वाजिब नहीं होगी।
📚बहार ए शरीअत, जिल्द 3, हिस्सा 15, सफ़ा 332 - 333
जारी है......
✒️✒️ मिन जानिब :- इल्म की रौशनी
Follow this link to join my WhatsApp group: https://chat.whatsapp.com/LkiwZ53xyou9QpJlXzYcfg
*Join Our Telegram group*
ILM KI RAUSHNI
https://t.me/ILMKIRAUSHNI
Qurbani Ka Bayan, Masail Part 7
0 Comments