क़ुर्बानी का बयान
क़ुर्बानी के बाअज़ मुस्तहबात, मसाइल
(पार्ट 20)
1️⃣8️⃣ मुस्तहब ये है कि क़ुर्बानी का जानवर ख़ूब फ़रबा और ख़ुबसूरत और बड़ा हो और बकरी की क़िस्म में से क़ुर्बानी करनी हो तो बेहतर सिंग वाला मेंढा चितकबरा हो जिस के ख़सिये कूट कर ख़स्सी कर दिया हो कि हदीस शरीफ़ में है हुज़ूर नबी ए अकरम “ﷺ” ने ऐसे मेंढे की क़ुर्बानी की।
1️⃣9️⃣ ज़बह करने से पहले छुरी को तेज़ कर लिया जाए और ज़बह के बाद जब तक जानवर ठंढ़ा ना हो जाए उस के तमाम आअज़ा से रूह निकल ना जाए उस वक़्त तक हांथ पांव ना काटें और ना चमड़ा उतारें और बेहतर ये है कि अपनी क़ुर्बानी अपने हांथ से करे अगर अच्छी तरह ज़बह करना जानता हो और अगर अच्छी तरह ना जानता हो तो दूसरे को हुक्म दे वो ज़बह करे मगर उस सूरत में बेहतर ये है कि वक़्ते क़ुर्बानी हाज़िर हो हदीस शरीफ़ में है हुज़ूर ए अक़दस “ﷺ” ने हज़रत ए फ़ातिमा ज़हरा رضی اللہ تعالٰی عنہا से फ़रमाया :- खड़ी हो जाओ और अपनी क़ुर्बानी के पास हाज़िर हो जाओ की उसके ख़ून के पहले ही क़तरा में जो कुछ गुनाह किए हैं सब की मग़फ़िरत हो जाएगी इस पर अबु सईद ख़ुदरी رضی اللہ تعالٰی عنہ ने अर्ज़ की या नबी अल्लाह “ﷺ” ये आपकी आल के लिए ख़ास है या आप की आल के लिए भी है और आमह मुस्लिमिन के लिए भी फ़रमाया कि मेरी आल के लिए ख़ास भी है और तमाम मुस्लिमिन के लिए आम भी है।
2️⃣0️⃣ क़ुर्बानी का जानवर मुस्लमान से ज़बह कराना चाहिए अगर किसी मजुसी या दूसरे मुशरीक़ से क़ुर्बानी का जानवर ज़बह करा दिया तो क़ुर्बानी नहीं हुई बल्कि ये जानवर हराम व मुरदाद है और कताबी से क़ुर्बानी का जानवर ज़बह कराना मकरुह है कि क़ुर्बानी से मक़सूद तक़र्रुब इलल्लाह है ( यानी अल्लाह عزوجل की रज़ा हासिल करना है) इस में काफ़िर से मदद ना ली जाए बल्कि बाअज़ अइम्मा के नज़दीक इस सूरत में भी क़ुर्बानी नहीं होगी मगर हमारा मज़हब वही पहला है कि क़ुर्बानी हो जाएगी और मकरुह है।
📚 बहार ए शरीअत, जिल्द 3, हिस्सा 15, सफ़ा 344
जारी है..........
✒️✒️ मिन जानिब :- इल्म की रौशनी
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Qurbani Ke Baaj Mustahbaat, Masail Part 20
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