Ramzan Ke Roze Kis Par Farz Hain?

रमज़ान का तोहफ़ा पार्ट 6

📝 रमज़ान के रोज़े किस पर फ़र्ज़ हैं ?


➡️ हर मुसलमान मर्द औरत जो समझदार और बालिग़ हो उस पर रमज़ान के रोज़े फ़र्ज़ हैं नाबालिग बच्चे और पागल पर रोज़े फ़र्ज़ नहीं हैं। औरतों को उनके माहवारी के दिनों में रोज़े रखने की इजाज़त नहीं है, रमज़ान के बाद इन रोज़ों की कज़ा करें जो कमज़ोर औरत हमल यानी पेट से हो या बच्चे को दूध पिलाती हो और रोज़े रखने की वजह से अपनी या बच्चे की जान जाने या सख़्त बीमारी का ख़तरा महसूस करे वह रोज़े कज़ा कर सकती है यूं ही हर बीमार और कमज़ोर आदमी रमज़ान के रोज़े रखने की वजह से बीमारी ख़तरनाक होने या जान जाने का सही गुमान करे उसको भी रोज़ा कज़ा करने की इजाज़त है।

जो शख़्स शरअन मुसाफ़िर है उसको क़ुरआन व हदीस में रमज़ान के रोज़े न रखने की इजाज़त दी गई है लेकिन सफ़र में अगर आराम हो कोई ख़ास परेशानी न हो तो रोज़ा रख लेना ही बेहतर है हाँ अगर न रखे तब भी वह गुनाहगार नहीं है जबकि रमज़ान के बाद कज़ा कर ले।

जो शख़्स बुढ़ापे की वजह से इतना कमज़ोर हो गया कि उसमें रोज़ा रखने की ताकत नहीं और आइंदा सही होने की भी कोई उम्मीद नहीं उस पर रोज़े माफ़ हैं। लेकिन हर रोज़े के बदले फ़िदया देना उस पर वाजिब है। और फ़िदया यह है कि हर रोज़े के बदले एक मोहताज को दोनों वक़्त पेट भरकर खाना खिलायें या हर रोज़े के बदले सदक़ा-ए-फ़ित्र के बराबर गल्ला या रूपया ख़ैरात करे। जो ज़्यादा सही तहक़ीक़ के मुताबिक़ तकरीबन 2 किलो 45 ग्राम गेहूँ है।

आजकल सही मआनि में ज़रूरत मन्द मोहताज़ व मिसकीन नहीं मिलते आम तौर पर पेशावर फ़क़ीर हैं उनमें भी ज़्यादातर बे नमाज़ी फ़ासिक व बदकार, गुन्डे लफ़ंगे जुआरी और शराबी तक हैं लेहाज़ा दीनी मदरसों के तलबा और ज़रूरतमन्द मुस्तहक मस्जिदों के इमामों मोअज्जिनों को इस क़िस्म की रकमें या गल्ले दे दिये जायें तो ज़्यादा बेहतर है।

वह औरतें जिनके शौहर इन्तिक़ाल कर गये और उन्होने दूसरा निकाह भी न किया ऐसे ही वह घर जिनमें एक ही कमाने वाला था वह भी बीमार हो गया इस किस्म के लोग अगर साहिबे ज़ायेदाद न हों सूदकात व ख़ैरात ज़कात के मुस्तहक़ हों ऐसों को तलाश करके देना चाहिए पेशावर और मांगने वालों से ऐसे ज़रूरतमन्दों को देना ज़्यादा सवाब का काम है। और उन लोगों को भी लेने में शर्म नहीं करना चाहिए आजकल कुछ लोगों को देखा कि वह बेईमानी ख़यानत और क़र्ज़ व उधार लेकर न देने के आदी हैं लेकिन अगर कोई ज़कात सदका ख़ैरात या फ़िदये की रक़म दे तो इस को लेने में अपनी तौहीन समझते हैं, यह उसकी भूल है।

अगर कोई शख़्स ज़कात, फ़ितरह, सदक़ा वग़ैरह व ख़ैरात का मुस्तहक़ और ज़रूरत मन्द हो लेकिन लेने में शर्म महसूस करे तो उसको बताया न जाये कि यह ज़कात ख़ैरात है हदिया या तोहफ़ा नियोता वग़ैरह जिस नाम से चाहे देदे आपकी ज़कात, फ़िदया, क़फ्फारा अदा हो जाएंगे।

और जिस बूढ़े के तन्दुरुस्त होने की उम्मीद न हो और साथ ही गरीब व नादार फ़िदया देने पर कुदरत न रखता हो उस को चाहिए कि तौबा व इस्तिग़फ़ार करता रहे उसके लिए रोज़े माफ़ हैं।

📚 ख़ज़ाइनुल इरफ़ान

✍️ मौलाना तत्हीर अहमद रज़वी बरेलवी

📚 रमज़ान का तोहफ़ा सफ़ा 9,10

✒️✒️मिन जानिब :- इल्म की रौशनी

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Ramzan Ka Tohfa 

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