रोज़ा का बयान और मसाइल
पार्ट 3
4️⃣ माहे रमज़ान का रोज़ा फ़र्ज़ जब होगा कि वह वक़्त जिस में रोज़ा की इबतदा कर सके पा ले यानी सुबह सादिक़ से ज़हवेकुबरा तक कि उस के बाद रोज़ा की नियत नहीं हो सकती, लिहाज़ा रोज़ा नहीं हो सकता और रात में नियत हो सकती है मगर रोज़ा की महल नहीं, लिहाज़ा अगर मजनून को रमज़ान की किसी रात में होश आया और सुबह जुनून की हालत में हुई या ज़हवेकुबरा के बाद किसी दिन होश आया तो उस पर रमज़ान के रोज़े की क़ज़ा नहीं, जबकि पूरा रमज़ान उसी जुनून में गुज़र जाए और एक दिन भी ऎसा वक़्त मिल गया, जिस में नियत कर सकता है तो सारे रमज़ान की क़ज़ा लाज़िम है।
5️⃣ रात में रोज़ा की नियत की और सुबह ग़शी की हालत में हुई और ये ग़शी कई दिन तक रही तो सिर्फ़ पहले दिन का रोज़ा हुआ बाक़ी दिनों की क़ज़ा रखे, अगरचे पूरे रमज़ान भर ग़शी रही अगरचे नियत का वक़्त ना मिला।
6️⃣ अदाए रोज़ा ए रमज़ान और नज़रेमोअय्यन और नफ़्ल के रोज़ों के लिए नियत का वक़्त ग़ुरूबे आफ़ताब से ज़हवेकुबरा तक है, उस वक़्त में जब नियत कर ले, ये रोज़े हो जाएंगे। लिहाज़ा आफ़ताब डूबने से पहले नियत की के कल रोज़ा रखूँगा फ़िर बेहोश हो गया और ज़हवेकुबरा के बाद होश आया तो ये रोज़ा ना हुआ और आफ़ताब डूबने के बाद नियत की थी तो हो गया।
7️⃣ ज़हवेकुबरा नियत का वक़्त नहीं, बल्कि उस से पेशतर (पहले) नियत हो जाना ज़रूर है और अगर ख़ास उस वक़्त यानी जिस वक़्त आफ़ताबे ख़ित्त निस्फ़ुननहार शरयी पर पहुंच गया, नियत की तो रोज़ा ना हुआ।
8️⃣ नियत के बारे में नफ़्ल आम है, सुन्नत व मुस्तहब व मकरुह् सब को शामिल है कि उन सब के लिए नियत का वही वक़्त है।
9️⃣ जिस तरह और जगह बताया गया कि नियत दिल के इरादा का नाम है, ज़बान से कहना शर्त नहीं, यहां भी वही मुराद है मगर ज़बान से कह लेना मुस्तहब है,
🟣 अगर रात में नियत करे तो युं कहे :-
نویت ان اصوم غدا للہ تعالٰی من فرض رمضان ھذا
*तर्जुमा :-* मैंने नियत की के अल्लाह ﷻ के लिए इस रमज़ान का फ़र्ज़ रोज़ा कल रखूँगा।
🟤 और अगर दिन में नियत करे तो ये कहे :-
نویت ان اصوم ھذا الیوم للہ تعالٰی من فرض رمضان
*तर्जमा :-* मैंने नियत की के अल्लाह तआला के लिए आज रमज़ान का फ़र्ज़ रोज़ा रखूँगा।
और अगर तबर्रुक व तलबे तौफ़िक़ के लिए नियत के अल्फाज़ में इंशा अल्लाह तआला भी मिला लिया तो हर्ज नहीं और अगर पक्का इरादा ना हो, मुज़बज़ब हो तो नियत ही कहां हुई।
1️⃣0️⃣ दिन में नियत करे तो ज़रूर है कि ये नियत करे कि मैं सुबह सादिक़ से रोज़ादार हुँ और अगर ये नियत है कि अब से रोज़ादार हुँ, सुबह से नहीं तो रोज़ा ना हुआ।
1️⃣1️⃣ अगरचे इन तीन क़िस्म के रोज़ों की नियत दिन में भी हो सकती है, मगर रात में नियत कर लेना मुस्तहब है।
1️⃣2️⃣ युं नियत की के कल कहीं दावत हुई तो रोज़ा नहीं और ना हुई तो रोज़ा है ये नियत सही नहीं, बहरहाल वह रोज़ादार नहीं।
1️⃣3️⃣ रमज़ान के दिन में ना रोज़ा की नियत है ना ये कि रोज़ा नहीं, अगरचे मालूम है कि ये महीना रमज़ान का है तो रोज़ा ना हुआ।
📚 बहार ए शरीअत, जिल्द 1, हिस्सा 5, सफ़ा 967 - 968
🔵 *मुश्किल अल्फाज़ के माना* ⤵️⤵️
*(1)* ज़हवेकुबरा / निस्फ़ुननहार :- निस्फ़ुननहार शरयी को ज़हवेकुबरा कहते हैं, निस्फ़ुननहार शरयी मालूम करने का ये तरीक़ा है कि आज जिस वक़्त से सुबहे सादिक़ शुरू हुई उस वक़्त से लेकर सूरज डूबने तक जितने घंटे हो उनके दो हिस्से करो पहले हिस्से के ख़त्म पर निस्फ़ुननहार शरयी शुरू हो जाएगी और सूरज ढ़लते ही ख़त्म हो जाएगी।
*(2)* सुबहे सादिक़ :- एक रौशनी है जो सूरज निकलने से पहले सूरज के ऊपर आसमान के पूर्बी किनारों में दिखाई देती है और बढ़ती जाती है यहां तक कि तमाम आसमान पर फ़ैल जाती है। और उजाला हो जाता है।
*(3)* जुनून :- पागलपन / दिमाग़ी ख़लल
*(4)* मजनू :- पागल
*(5)* ग़शी :- बेहोशी
*(6)* नज़रेमोअय्यन :- किसी ख़ास चीज़ की मन्नत मानना।
🟣🟡🔵 इंशा अल्लाह आगे जारी रहेगा.....
✒️✒️मिन जानिब :- इल्म की रौशनी
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Roza Ka Bayan Aur Masail Bahar E Shariat
Part 3
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