Roza Ka Bayan Aur Masail Part 7

रोज़ा का बयान और मसाइल

पार्ट 7


2️⃣5️⃣ कोई मुसलमान दारूल हरब में क़ैद था और हर साल यह सोचकर कि रमज़ान का महीना आ गया, रमज़ान के रोज़े रखे बाद को मालूम हुआ कि किसी साल भी रमज़ान में ना हुए बल्कि हर साल रमज़ान से पेशतर हुए तो पहले साल का तो हुआ ही नहीं कि रमज़ान से पेशतर रमज़ान का रोज़ा हो नहीं सकता और दूसरे-तीसरे साल की निस्बत यह है कि अगर मुतल्लिक़ रमज़ान की नियत की थी तो हर साल के रोज़े साल गुज़िस्ता के रोज़ों की कज़ा हैं और अगर इस साल की रमज़ान की नियत से रखे तो किसी साल के न हुए।

2️⃣6️⃣ अगर सूरत ए मज़कुरह में तहरी की यानी सोचा और दिल में यह बात जमी कि यह रमज़ान का महीना है और रोज़ा रखा, मगर वाक़य में रोज़े शव्वाल के महीने में हुए तो अगर रात से नियत की तो हो गए, क्योंकि क़ज़ा में क़ज़ा की नियत शर्त नहीं, बल्कि अदा की नियत से भी कज़ा हो जाती है फ़िर अगर रमज़ान व शव्वाल दोनों तीस-तीस (30) दिन या उनत्तीस-उनत्तीस (29) दिन के हैं तो एक रोज़ा और रखे कि ईद का रोज़ा ममनुअ है और अगर रमज़ान तीस का और शव्वाल उनत्तीस का तो दो और रखे और रमज़ान उनत्तीस का था और यह तीस का तो पूरे हो गए और अगर वो महीना जिलहिज्जा का था तो अगर दोनों तीस या उनत्तीस के हैं तो चार रोज़े और रखे और रमज़ान तीस का था यह उनत्तीस का तो पाँच और बिलअक्स तो तीन रखे। गर्ज़ ममनुअ रोज़े निकाल कर वह तादाद पूरी करनी होगी जितने रमज़ान के दिन थे।

2️⃣7️⃣ अदाए रमज़ान और नज़रे मोअय्यन और नफ़्ल के अलावा बाक़ी रोज़े, मसलन क़ज़ाए रमज़ान और नज़रे मोअय्यन और नफ़्ल की क़ज़ा (यानी नफ़्ली रोज़ा रख कर तोड़ दिया था उसकी क़ज़ा) और नज़रे मोअय्यन की क़ज़ा और कफ़्फ़ारा का रोज़ा और हरम में शिकार करने की वजह से जो रोज़ा वाजिब हुआ और वह हज में वक़्त से पहले सर मुड़ाने का रोज़ा और तमत्तो का रोज़ा, उन सब में ऐन सुबह चमकते वक़्त या रात में नियत करना ज़रूरी है और यह भी ज़रूरी है कि जो रोज़ा रखना है, ख़ास उस मोअय्यन की नियत करे और उन रोज़ों की नियत अगर दिन में की तो नफ़्ल हुए फ़िर भी उनका पूरा करना ज़रूरी है तोड़ेगा तो क़ज़ा वाजिब होगी। अगरचे यह उसके इल्म में हो कि जो रोज़ा रखना चाहता है ये वो नहीं है बल्कि नफ़्ल होगा।

2️⃣8️⃣ यह गुमान करके कि उसके ज़िम्मे रोज़े की क़ज़ा है रोज़ा रखा। अब मालूम हुआ कि गुमान ग़लत था तो अगर फ़ौरन तोड़ दे तो तोड़ सकता है, अगरचे बेहतर यह है कि पूरा कर ले और फ़ौरन न तोड़ा तो अब नहीं तोड सकता, तोड़ेगा तो क़ज़ा वाजिब है।

2️⃣9️⃣ रात में क़ज़ा रोज़े की नियत की, सुबह को उसे नफ़्ल करना चाहता है तो नहीं कर सकता।

3️⃣0️⃣ नमाज़ पढ़ते में रोज़ा की नियत की तो नियत सही है।

3️⃣1️⃣ कई रोज़े क़ज़ा हो गए तो नियत में यह होना चाहिए कि इस रमज़ान के पहले रोज़े की क़ज़ा, दूसरे की क़ज़ा और अगर कुछ इस साल के क़ज़ा हो गए, कुछ अगले साल के बाक़ी हैं तो यह नियत होनी चाहिए कि इस रमज़ान की और उस रमज़ान की क़ज़ा और अगर दिन और साल को मोअय्यन न किया, जब भी हो जाएंगे।

3️⃣2️⃣ रमज़ान का रोज़ा कसदन तोड़ा था तो उस पर उस रोज़े की कज़ा है और साठ (60) रोज़े कफ़्फ़ारा है अब उस ने इकसठ (61) रोज़े रख लिए, क़ज़ा का दिन मोअय्यन न किया तो हो गया।

📚बहार ए शरीअत, जिल्द 1, हिस्सा 5, सफ़ा 970 - 972

🟤🟡🟣 इंशा अल्लाह आगे जारी रहेगा......

✒️✒️मिन जानिब :- इल्म की रौशनी

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Roza Ka Bayan Aur Masail Bahar E Shariat Part 7

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