रोज़ा का बयान और मसाइल
पार्ट 8
3️⃣3️⃣
*یوم الشک*
यानी शाबान के तीसवीं (30) तारीख़ को नफ़्ल ख़ालिस की नियत से रोज़ा रख सकते हैं और नफ़्ल के सिवा कोई और रोज़ा रखा तो मकरुह है, ख़्वाह मुतल्लिक़ रोज़ा की नियत हो या फ़र्ज़ की या किसी वाजिब की, ख़्वाह नियत ए मोअय्यन की, कि हो या तरद्दुद के साथ यह सब सूरतें मकरुह हैं। फ़िर अगर रमज़ान की नियत है तो मकरुहे तहरीमी है, वरना मुकीम के लिए तनज़ीही और मुसाफ़िर ने अगर किसी वाजिब की नियत की तो कराहत नहीं फिर अगर उस दिन का रमज़ान होना साबित हो जाए तो मुकीम के लिए बहरहाल रमज़ान का रोज़ा है और अगर यह ज़ाहिर हो कि वह शाबान का दिन था और नियत किसी वाजिब की की थी तो जिस वाजिब की नियत की थी वह हुआ और अगर कुछ हाल न खुला तो वाजिब की नियत बेकार गई और मुसाफ़िर ने जिसकी नियत की बहरे सूरत वही हुआ।
3️⃣4️⃣ अगर तीसवीं (30) तारीख़ ऐसे दिन हुई कि उस दिन रोज़ा रखने का आदी था तो उसे रोज़ा रखना अफ़ज़ल है, मसलन कोई शख़्स पीर या जुमेरात का रोज़ा रखा करता है और तीसवीं (30) उसी दिन पड़ी तो रखना अफ़ज़ल है। यूँही अगर चंद रोज पहले से रख रहा था तो अब *یوم الشک* में कराहत नहीं। कराहत उसी सूरत में है कि रमज़ान से एक (1) या दो (2) दिन पहले रोज़ा रखा जाए यानी सिर्फ़ तीस (30) शाबान को या उनत्तीस (29) और तीस (30) को।
3️⃣5️⃣ अगर न तो उस दिन रोज़ा रखने का आदी था न कई रोज पहले से रोज़े रखे तो अब खास लोग रोज़ा रखें और अवाम न रखें, बल्कि अवाम के लिए यह हुक्म है कि ज़हवेकुबरा तक रोज़ा के मिस्ल रहें, अगर उस वक्त तक चांद का सबूत हो जाए तो रमज़ान के रोज़े की नियत कर लें वरना खा पी लें। ख़्वास से मुराद यहाँ ओलमा ही नहीं, बल्कि जो शख़्स यह जानता हो कि *یوم الشک* में इस तरह रोज़ा रखा जाता है, वह ख़्वास में है वरना अवाम में।
3️⃣6️⃣
*یوم الشک*
के रोज़ा में यह पक्का इरादा कर ले कि यह रोज़ा नफ़्ल है तरद्दुद न रहे, यूँ न हो कि अगर रमज़ान है तो यह रोज़ा रमज़ान का है वरना नफ़्ल का या यूं कि अगर आज रमज़ान का दिन है तो यह रोज़ा रमज़ान का है, वरना किसी और वाजिब का कि यह दोनों सूरतें मकरुह हैं। फ़िर अगर उस दिन का रमज़ान होना साबित हो जाए तो फ़र्ज़ ए रमज़ान अदा होगा। वरना दोनों सूरतों में नफ़्ल है और गुनहगार बहरहाल हुआ और यूँ भी नियत न करे कि यह दिन रमज़ान का है तो रोज़ा है, वरना रोज़ा नहीं कि इस सूरत में तो न नियत ही हुई, न रोज़ा हुआ और अगर नफ़्ल का पूरा इरादा है मगर कभी-कभी दिल में यह ख़्याल गुज़र जाता है कि शायद आज रमज़ान का दिन हो तो इसमें हर्ज़ नहीं।
3️⃣7️⃣ अवाम को जो यह हुक्म दिया गया कि ज़हवेकुबरा तक इंतज़ार करें, जिसने इसपर अम्ल किया मगर भूल कर खा लिया फिर उस दिन का रमज़ान होना ज़ाहिर हुआ तो रोज़ा की नियत कर ले हो जाएगा कि इंतजार करने वाला रोज़ादार की हुक्म में है और भूल कर खाने से रोज़ा नहीं टूटता।
📚बहार ए शरीअत, जिल्द 1, हिस्सा 5, सफ़ा 972 - 973
🟣🟡🟤 *अलहमदुलिल्लाह रोज़ा का बयान और मसाइल मुकमल हुए। इंशा अल्लाह आगे उन चीज़ों का बयान किया जाएगा जिनसे रोज़ा नहीं जाता।*
✒️✒️ मिन जानिब :- इल्म की रौशनी
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Roza Ka Bayan Aur Masail Part 8
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