रोज़ा के मकरूहात का बयान
पार्ट 1
चंद हदीस शरीफ़
1️⃣ व 2️⃣
बुख़ारी व अबू दाऊद व तिर्मिज़ी व निसाई व इब्ने माजा अबू हुरैरह رضی اللہ تعالٰی عنہ से रिवायत करते हैं रसूलल्लाह “ﷺ” ने फ़रमाया:- जो बुरी बात कहना और उस पर अमल करना ना छोड़े, तो अल्लाह तआला को उसकी कुछ हाजत नहीं कि उसने खाना पीना छोड़ दिया है। और इसी के मिस्ल तिब्रानी ने अनस رضی اللہ تعالٰی عنہ से रिवायत की।
3️⃣ व 4️⃣ इब्ने माजा व निसाई व इब्ने खुज़ैमा व हाकिम व बेहक़ी व दारमी अबू हुरैरह رضی اللہ تعالٰی عنہ से रावी, कि रसूलल्लाह “ﷺ” ने फ़रमाया :- बहुत से रोज़ादार ऐसे हैं कि उन्हें रोज़ा से सिवा प्यास के कुछ नहीं और बहुत से रात में क़याम करने (नमाज़ पढ़ने) वाले ऐसे कि उन्हें जागने के सिवा कुछ हासिल नहीं, और उसी के मिस्ल तिब्रानी ने इब्ने उमर رضی اللہ تعالٰی عنہما से रिवायत की।
5️⃣ व 6️⃣ बेहक़ी अबू उबैदा और तिब्रानी अबू हुरैरह رضی اللہ تعالٰی عنہما से रावी, के हुज़ूर “ﷺ” ने फ़रमाया :- रोज़ा सिपर (ढाल) है, जब तक उसे फाड़ा ना हो। अर्ज़ की गई, किस चीज़ से फाड़ेगा ? इरशाद फ़रमाया :- झूठ या ग़ीबत से।
7️⃣ इब्ने खुज़ैमा व इब्ने हब्बान व हाकिम अबू हुरैरह رضی اللہ تعالٰی عنہ से रावी, कि हुज़ूर “ﷺ” ने फ़रमाया :- रोज़ा इसका नाम नहीं कि खाने और पीने से बाज़ रहना हो रोज़ा तो ये है कि लग़्व व बेहूदा बातों से बचा जाए।
8️⃣ अबू दाऊद ने अबू हुरैरह رضی اللہ تعالٰی عنہ से रिवायत की, कि एक शख़्स ने नबी “ﷺ” से रोज़ादार को मुबाशिरत करने के बारे में सवाल किया, हुज़ूर “ﷺ” ने उन्हें इजाज़त दी फ़िर एक दूसरे साहब ने हाज़िर होकर यही सवाल किया तो उन्हें मना फ़रमाया और जिनको इजाज़त दी थी, बूढ़े थे और जिनको मना फ़रमाया जवान थे।
9️⃣ अबू दाऊद व तिर्मिज़ी आमिर बिन रबिया رضی اللہ تعالٰی عنہ से रावी, कहते हैं मैंने बेशुमार बार नबी “ﷺ” को रोज़ा में मिस्वाक करते देखा।
🟣 *मसाइल ⤵️*
1️⃣ झूट, चुग़ली, ग़ीबत, गाली देना बेहूदा बात, किसी को तकलीफ़ देना कि ये चीज़ें वैसे भी नाजाइज़ व हराम हैं रोज़ा में और ज़्यादा हराम और इनकी वजह से रोज़ा में कराहत आती है।
2️⃣ रोज़ादार को बिला उज़्र किसी चीज़ का चखना या चबाना मकरूह है चखने के लिए उज़्र ये है कि मसलन औरत का शौहर या बांदी ग़ुलाम का आक़ा बदमिज़ाज है कि नमक कमो बेश होगा तो उसकी नाराज़ी का बाइस (सबब) होगा तो इस वजह से चखने में हर्ज़ नहीं, चबाने के लिए ये उज़्र है कि इतना छोटा बच्चा है कि रोटी नहीं खा सकता और कोई नरम ग़िज़ा नहीं जो उसे खिलाई जाए ना हैज़ व निफ़ास वाली या कोई और बेरोज़ा ऐसा है जो उसे चबाकर दे दे तो बच्चा के खिलाने के लिए रोटी वगैरा चबाना मकरूह नहीं।
चखने के वो माना नहीं जो आजकल आम मुहावरा है यानी किसी चीज़ का मज़ा दरयाफ़्त (मालूम) करने के लिए उसमें से थोड़ा खा लेना के यूं हो तो कराहत कैसी रोज़ा ही जाता रहेगा बल्कि कफ़्फ़ारा के शराइत पाए जाएं तो कफ़्फ़ारा भी लाज़िम होगा बल्कि चखने से मुराद ये है कि ज़बान पर रखकर मज़ा दरयाफ़्त कर लें और उसे थूक दें उसमें से हल्क़ में कुछ ना जाने पाए।
📚 बहार ए शरीअत, जिल्द 1, हिस्सा 5, सफ़ा 995 - 997
🟤 आगे जारी रहेगा........
✒️✒️ मिन जानिब :- इल्म की रौशनी
Follow this link to join my WhatsApp group: https://chat.whatsapp.com/Ez5EKTrmfLB2PojMWkfU3g
Roza Ke Makroohat Ka Bayan Part 1
0 Comments