Roze Ki Hiqmaten

रमज़ान का तोहफ़ा पार्ट 3

📝 रोज़े की हिक़मतें


➡️ रोज़े में दीनी उख़रवी फ़ायदों के साथ दुनयवी फ़ायदे भी बहुत ज़्यादा हैं ग़ैर मुस्लिम दानिश मन्दों ने भी इस्लामी रोज़ों की तारीफ़ की है। रोज़े रखने से भूखे - प्यासे रहने की और भूख - प्यास को बर्दाश्त करने की आदत पड़ती है और यह इन्सानी ज़िन्दगी के लिये ज़रूरी है। रोज़े रखने से खाने - पीने की क़द्र व क़ीमत मालूम होती है। सही बात यह है कि भरे पेट पर उम्दा गिज़ाएं वह लज़्ज़त नहीं देतीं जो भूखे और खाली पेट वाले को घटिया क़िस्म की गिज़ाओं में हासिल होती है। एक ग़रीब रोज़ेदार को दिनभर रोज़ा रखकर शाम को एक गिलास पानी सादा सालन और रोटी के दो लुक़्मों में जो मज़ा आता है, वह अमीरों रईसों नवाबों बादशाहों को सैकड़ों तरह के खाने सजे दस्तरख़्वानों पर नहीं आता है। और यह अल्लाह तआला का फ़ज़्ल है। वह जिस पर चाहता है फरमाता है।

एक बुज़ुर्ग से मनक़ूल है कि जब वह खाना खाते तो यह कहते या अल्लाह तआला तेरा शुक्र है तूने भूख अता फ़रमाई मुरीदों ने अर्ज किया कि भूख का शुक्र करते हैं खाने का शुक्र नहीं करते तो फ़रमाया अगर भूख न होती तो खाने में मज़ा न आता। रोज़ा रखने से इन्सान भूखा रहता है और उसे भूख और प्यास की परेशानी महसूस होती है तो भूखे लोगों को खिलाने का जज़्बा पैदा होता है रोज़ा रखने में डॉक्टरी और तिब्बी फ़ायदे भी बहुत ज़्यादा हैं। रोज़े और उनकी भूख बहुत सी बीमारियों को ख़त्म करती है जिस्म को साफ़ करती और निखारती है पेट की गन्दगी आलाइशों बीमारी के कीड़ों और जरासीम को जलाती है लेकिन सहरी व इफ़्तार के वक़्त ढूंसकर खाना खाने वाले या रात में बार - बार खाने वाले रोज़े के तिब्बी और जिस्मानी फ़ायदे पूरे तौर पर नहीं पाते।

✍️ मौलाना तत्हीर अहमद रज़वी बरेलवी

📚रमज़ान का तोहफ़ा, सफ़ा 4, 5

✒️✒️मिन जानिब :- इल्म की रौशनी

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Ramzan Ka Tohfa Part 3

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