रमज़ान का तोहफ़ा पार्ट 13
📝 शबे क़द्र का बयान?
➡️ शबे क़द्र बड़ी फज़ीलत वाली रात है। क़ुरआन ए करीम में इस एक रात की इबादत को एक हज़ार महीनों की इबादत से बढ़कर बताया गया है।
ज़्यादा सही बात यह है कि रमज़ान शरीफ़ के आख़िरी दस दिनों में 21,23,25,27 और 29वीं रातों में से वह एक रात होती है। लिहाज़ा शबे क़द्र की फज़ीलत हासिल करने के लिए काफ़ी मुसलमान भाई इन सारी रातों में रात भर इबादत करते हैं।
आजकल शबे क़द्र और शबे बरात में भी बहुत तेज़ और बहुत दूर तक आवाज़ फेंकने वाले माइक्रोफ़ोन लगाकर सारी सारी रात तक़रीरें और नज़्में पढ़ने का रिवाज हो गया है। यह सब भी मुनासिब नहीं है और मुझको इसमें कुछ भलाई नज़र नहीं आती कि न ख़ुद ज़िक्रो इबादत व तिलावत करो न दूसरों को करने दो। अगर हो भी तो बग़ैर माइक के हो या घंटे डेढ़ घंटे प्रोग्राम चलाकर एकदम ख़ामोशी कर दी जाए और लोगों को नफ़्ल नमाज़ व क़ुरआन ए करीम पढ़ने का भी मौका दिया जाए और आजकल के अक़सर मुक़र्रिरों की तक़रीरें और शाइरों की शाइरी में कोई नेकी नज़र नहीं आती और न ही उन्हें दीन सीखने सिखाने का शग्ल कहा जा सकता है सिवाए जज़्बात व जोश और तरह तरह के अन्दाज़ और तरज़ों के कुछ हासिल नहीं होता। और आज के दौर में इबादत के लिए भी लाउडस्पीकर ज़रूरी सा हो गया है यह बात काबिले अफ़सोस है। और जो लोग इन रातों में सारी रात इबादत न कर सकें उन्हें चाहिए कि कुछ देर नफ़्ल नमाज़ और क़ुरआन ए करीम की तिलावत में गुज़ार लें।
✍️ मौलाना तत्हीर अहमद रज़वी बरेलवी
📚 रमज़ान का तोहफ़ा सफ़ा 33,34
✒️✒️मिन जानिब :- इल्म की रौशनी
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