रमज़ान का तोहफ़ा पार्ट 11
📝 शबीना
➡️ रमज़ान की किसी रात में नफ़्ल नमाज़ जमाअत से अदा करते हैं। और उस में एक या चन्द हाफिज़ों से पूरा क़ुरआन सुनते हैं इस को शबीना कहते हैं। आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खाँ علیہ الرحمہ बरेलवी ने इसको मकरूह लिखा है और इस की इजाज़त नहीं दी है।
📚फ़तावा रज़वीया जिल्द 7 सफ़ा 72 मतबुआ रज़ा फाउंडेशन लाहौर
मकरूह होने की वजह यह है कि जमाअत की जाती है और लोगो को शामिल करके पूरा क़ुरआन पढ़ा जाता है और आम तौर पर लोग इसे बोझ समझते हैं और शरमा शरमी में शरीक रहते हैं। सदरूश्शरिआ हज़रत मौलाना अमजद अली आज़मी علیہ الرحمہ फ़रमाते हैं।
आम तौर पर इस ज़माने में जो शबीना पढ़ा जाता है कि एक रात में पूरा क़ुरआन पढ़ा जाता है इस पढ़ने की नौअइयत (तरीक़ा) ऐसी होती है कि जल्दबाज़ी में हुरूफ़ तो हुरूफ़ अल्फ़ाज तक खा जाते हैं क़ुरआन ए करीम को सही तौर पर नहीं पढ़ते और सामअईन (सुन्ने वाले) में कोई लेटा है कोई चाय पी रहा है कुछ ऐसी ही हालत होती है जिसकी वजह से उलमा ने शबीना नाजाईज़ होने का हुक्म दिया है।
📚 फ़तावा अमजदिया ज़िल्द 1 सफ़हा 340
हां अगर कोई साहब अकेले नमाज़ या बग़ैर नमाज़ के एक रात में एक या इस से भी ज़्यादा क़ुरआन की तिलावत करें तो कुछ गुनाह नहीं लेकिन जमाअत में ज़्यादा लम्बी किराअत की इजाज़त नहीं।
✍🏻 मौलाना तत्हीर अहमद रज़वी बरेलवी
📚 रमज़ान का तोहफ़ा सफ़ा 17,18
✒️✒️मिन जानिब :- इल्म की रौशनी
Follow this link to join my WhatsApp group: https://chat.whatsapp.com/KFbC9BHqjEcJugVf2wQ8kY
Shabeena Taraweeh
Shabina Taraweeh
Ramzan Ka Tohfa Part 11
0 Comments