Un Sooraton Ka Bayan Jinme Kaffara Bhi Lazim Hai, Masail Part 3

उन सूरतों का बयान जिनमें कफ़्फ़ारा भी लाज़िम है, मसाइल 

पार्ट 3


2️⃣0️⃣ सेहरी का निवाला मुंह में था के सुबह तुलू हो गई (यानी सेहरी का वक़्त ख़त्म हो गया) या भूल कर खा रहा था निवाला मुंह में था कि याद आ गया और निगल लिया तो दोनों सूरतों में कफ़्फ़ारा वाजिब मगर जब मुंह से निकाल कर फ़िर खाया हो तो सिर्फ़ क़ज़ा वाजिब होगी कफ़्फ़ारा नहीं। 

2️⃣1️⃣ औरत ने नाबालिग़ या मजनून से वत़ी कराई या मर्द को वत़ी करने पर मजबूर किया तो औरत पर कफ़्फ़ारा वाजिब है मर्द पर नहीं। 

2️⃣2️⃣ मुश्क, ज़ाफ़रान, काफ़ूर, सिरका खाया या ख़रपज़ा (ख़रबूज़ा) तरबज़ (तरबूज़) ककड़ी खीरा बाक़ला का पानी पिया तो कफ़्फ़ारा वाजिब है। 

2️⃣3️⃣ रमज़ान में रोज़ादार क़त्ल के लिए लाया गया उसने पानी मांगा किसी ने उसे पानी पिला दिया फ़िर वो छोड़ दिया गया तो उस पर कफ़्फ़ारा वाजिब है। 

2️⃣4️⃣ बारी से बुख़ार आता था और आज बारी का दिन था उसने ये गुमान करके कि बुख़ार आएगा रोज़ा क़स्दन (जानबूझकर) तोड़ दिया तो इस सूरत में कफ़्फ़ारा साक़ित है, यूहीं औरत को मुअय्यन तारीख़ पर हैज़ आता था और आज हैज़ आने का दिन था उसने क़स्दन (जानबूझकर) रोज़ा तोड़ दिया और हैज़ ना आया तो कफ़्फ़ारा साक़ित हो गया यूहीं अगर यक़ीन था कि दुश्मन से आज लड़ना है और रोज़ा तोड़ डाला और लड़ाई ना हुई तो कफ़्फ़ारा वाजिब नहीं। 

2️⃣5️⃣ रोज़ा तोड़ने का कफ़्फ़ारा ये है कि मुमकिन हो तो एक रक़बा यानी बांदी या ग़ुलाम आज़ाद करे और ये ना कर सके मसलन उसके पास ना लौंडी ग़ुलाम है ना इतना माल कि ख़रीदे या माल तो है मगर रक़बा मयस्सर नहीं जैसे आजकल यहां हिंदुस्तान में तो पे दर पे (यानी लगातार) साठ (60) रोज़े रखे ये भी ना कर सके तो साठ (60) मसाकिन को भर भर पेट दोनों वक़्त खाना खिलाए और रोज़े की सूरत में अगर दरमियान (बीच) में एक दिन का भी छूट गया तो अब से साठ (60) रोज़े रखे पहले के रोजे महसूब ना होंगे अगरचे 59, रख चुका था अगरचे बीमारी वग़ैरह किसी उज़्र के सबब छूटा हो मगर औरत को हैज़ आ जाए तो हैज़ की वजह से जितने नाग़े हुए ये नाग़े नहीं शुमार किए जाएंगे यानी पहले के रोज़े और हैज़ के बाद वाले दोनों मिलकर साठ (60) हो जाने से कफ़्फ़ारा अदा हो जाएगा। 

2️⃣6️⃣ अगर दो रोज़े तोड़े तो दोनों के लिए दो कफ़्फ़ारे दे अगरचे पहले का भी कफ़्फ़ारा ना अदा किया हो। 

यानी जब्के दोनों दो रमज़ान के हों और अगर दोनों रोज़े एक ही रमज़ान के हों और पहले का कफ़्फ़ारा अदा ना किया हो तो एक ही कफ़्फ़ारा दोनों के लिए काफ़ी है। 

कफ़्फारा के मुतल्लिक़ दीगर जुज़यात किताबुत्तलाक़ बाबुज़्ज़िहार में
 انشاء اللہ تعالٰی
मालूम होंगी।

2️⃣7️⃣ आज़ाद व ग़ुलाम मर्द व औरत बादशाह व फ़क़ीर सब पर रोज़ा तोड़ने से कफ़्फ़ारा वाजिब होता है यहां तक कि बांदी को अगर मालूम था कि सुबह हो गई (यानी सेहरी का वक़्त ख़त्म हो गया) उसने अपने आक़ा को ख़बर दी कि अभी सुबह ना हुई उसने उसके साथ जिमा (हमबिस्तरी) किया तो लौंडी पर कफ़्फ़ारा वाजिब होगा और उसके मौला पर सिर्फ़ क़ज़ा है कफ़्फ़ारा नहीं। 

📚बहार ए शरीअत , जिल्द 1, हिस्सा 5, सफ़ा 994 - 995

🟣 रोज़ा के कफ़्फ़ारा का बयान मुकम्मल हुआ।

✒️✒️ मिन जानिब :- इल्म की रौशनी

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