Wiladat Ki Khushi Quran Wa Hadees Se


विलादत की ख़ुशी क़ुरआन व हदीस से


➡ *और याद करो अल्लाह की वह नेअमत (एहसान) जो तुम पर है।*
 📚 तर्जमह् कनज़ुल इमान, सूरतुल बकरह् , आयत न• 231

➡ *और अल्लाह की नेअमत का शुक्र करो अगर तुम उस को पूजते (मानते) हो।*
 📚  तर्जमह् कनज़ुल इमान, सूरतुन्नहल, आयत न• 114

➡और कुरआन करीम की सूराए इब्राहीम आयत न• 29 में 
 *जिन लोगों ने अल्लाह की नेअमत को कुफ्र से बदल डाला* की तफसीर में सहाबी-ए-रसूल हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास और हज़रत अमर इब्ने दीनार से सही बुख़ारी में यूँ मरवी है 

  ➡यानी जिन्होंने अल्लाह की नेअमत को कुफ्र से बदला वह कुरैश खान्दान के काफिर थे, और अल्लाह की नेअमत मुहम्मद सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम हैं। 
 📚 सही बुख़ारी, ज़िल्द 2, सफ़ह 566, किताबुलमग़ाज़ी बाब कत्ल अबी जहल

   ⚡️यानी कुरआन में जो लफ़्ज़ अल्लाह की नेअमत आया है, सही बुख़ारी की हदीस से यह मालूम हुआ वह हुज़ूर हैं, और पहले ज़िक्र की गई आयतों में और उस के अलावा भी कई आयतों में अल्लाह तआला ने अपनी नेअमत का ज़िक्र व चर्चा करने और इस नेअमत पर अल्लाह का शुक्र करने का हुक्म दिया, गोया कि हुज़ूर की तशरीफ़ आवरी पर खुशी का इज़हार करना और अल्लाह तआला की इस नेअमत का ज़िक्र और ख़ूब चर्चा करना अल्लाह का शुक्र करना है।

 ➡  एक जगह कुरआने करीम में फ़रमाया जाता है
  *आप कहिए अल्लाह के फ़ज़्ल और उसकी रहमत पर ख़ुशी मनाओ*
 📚 तर्जमह् कनज़ुल इमान, सूरह युनूस, आयत 58

➡एक मकाम पर यूँ फरमाया गया
   *और अपने रब की नेअमत को खूब बयान करो।*
📚 तर्जमह् कनज़ुल इमान, सूरह वद्दोहा, आयत नंबर 11

मैं पूछता हूँ कि हुज़ूर सल्लललाहु अलैहे वसल्लम से बढ़ कर अल्लाह तआला की कौन सी रहमत है और कौनसी नेअमत है, और कौन सा फज़्ल है तो आप की विलादत पर खुशी का इज़हार करना और जाइज़ तौर तरीक़ों से ख़ुशी मनाना क्यों नाजाइज़ हो गया?

➡ ख़ुलासा यह कि बाक़ाइदा एहतिमाम के साथ बारहवीं शरीफ़ मनाना या महफ़िले मीलाद का इन्अकाद करना अगर्चे इस्लाम में यह नये काम हैं। सहाबा व ताबेईन के दौर में उनका रिवाज न था। लेकिन उनकी असल कुरआन व हदीस से साबित है." और इन सब की असल हुज़ूर सल्लललाहु अलैहे वसल्लम की तशरीफ़ आवरी पर ख़ुशी का इज़हार आप का ज़िक्र और चर्चा करना और आप को याद रखना है यह यक़ीनन कुरआन व हदीस से साबित है।

➡कुरआन की एक मशहूर आयत यह भी है!
ورفعنا لك ذكرك (سورہ الم نشرح: آیت ٤
*हम ने आप के ज़िक्र को आप के लिए बुलन्द किया।*

  ⚡️तो अल्लाह का हुज़ूर सल्लललाहु अलैहे वसल्लम के ज़िक्र को बुलन्द करने। का मतलब यही तो होगा कि ख़ूब ज़्यादा आप का ज़िक्र कराया और आप का नाम मख़लूक़ की ज़बान पर जारी करा दिया, और चहार दांगे आलम में आप का, डंका बजवा दिया, बारहवीं शरीफ़ मनाने और महफ़िले मीलाद मुन्अक़िद करने से यह बातें ख़ूब अच्छी तरह हासिल होती हैं, और उन में अल्लाह व रसूल के ज़िक्र व चर्चे के अलावा और क्या है?

➡ हज़रत बरअ से मरवी हदीस पाक में है कि हुज़ूर सल्लल्लाहु तआला अलैहि वसल्लम जब मदीना तशरीफ़ लाये तो मैंने मदीना वालों को इतना ख़ुश होते किसी बात पर कभी न देखा जितना ख़ुश वह हुज़ूर सल्लललाहु अलैहे वसल्लम के तशरीफ़ लाने पर थे, यहाँ तक कि छोटे छोटे बच्चों को मैंने देखा कि वह ख़ुश हो कर कहते थें।
  *यह अल्लाह के रसूल हैं जो हमारे यहाँ तशरीफ लाए हैं*
📚सही बुख़ारी जि.1, स.बाब मक़्दमिन्नबीए इल्लमदीना

 ⚡️तो जब मदीने वालों ने मदीने में हुज़ूर सल्लललाहु अलैहे वसल्लम के आने की ख़ुशी मनाई थी तो दुनियाँ वालों को दुनियाँ में आने की ख़ुशी मनाना चाहिए, और अहले मदीना ने हिजरते मुस्तफ़ा और मदीने में आप की तशरीफ़ आवरी की इस ख़ुशी को हर साल के लिए बाक़ी भी रखा। यानी हिजरी सन तभी से चली जो हर साल आती है। और हर साल हुज़ूर सल्लललाहु अलैहे वसल्लम के मदीने आने की याद दिलाती है।

  ⚡️हुज़ूर सल्लललाहु अलैहे वसल्लम की तशरीफ़ आवरी की ख़ुशी को भुलाने वालों को चाहिए कि वह हिजरी सन का इस्तेमाल न किया करें, क्यों कि यह भी मदीने में हुज़ूर सल्लललाहु अलैहे वसल्लम के आने की याद गार है।

➡ अहादीस की किताबों में हुज़ूर सल्लललाहु अलैहे वसल्लम की पैदाइश की ख़ुशी में हुज़ूर सल्लललाहु अलैहे वसल्लम के चचा अबूलहब का अपनी बांदी सुवैबा को आज़ाद करने का वाक़्या भी बहुत मशहूर है। काफ़िर था लेकिन फिर भी उस ख़ुशी पर बांदी को आज़ाद करने की वजह से उस के अज़ाब में आसानी कर दी गई जैसा कि उसने ख़्वाब में अपने घरवालों को बताया था, देखिये 
📕सही बुखारी जि.2, स. 764 किताबुन्निकाह व उसकी शरह फत्हुलबारी व उम्दतुल कारी📕


✍🏻✍🏻 मौलाना तत्हीर अह़मद रज़वी बरेलवी 
📚बारहवीं शरीफ़ जलसे और जुलूस सफ़ा 08-12

✒✒ मिन जानिब :- मेम्बरान इल्म की रौशनी

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Maulana Tatheer Ahmad Razvi

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