ज़कात का बयान
ज़कात देने की फ़ज़िलत व सवाब न देने पर वईद व अज़ाब
➡️ क़ुरआन मजीद का फ़रमान आली शान है :-
*وَأَقِيمُواْ الصَّلاَةَ وَآتُواْ الزَّكَاةَ وَارْكَعُواْ مَعَ الرَّاكِعِينَ*
तर्जमा :- और नमाज़ क़ायम रखो और ज़कात दो और रुकुअ करने वालों के साथ रुकुअ करो।
📚 कन्ज़ुल ईमान, पारा 1, रुकुअ 5, आयत नम्बर 43
➡️ प्यारे दीनी भाइयों! ज़कात इस्लाम का तीसरा रुक्न है। ज़कात के माना नशो नुमा और पाक करने के हैं चूँकि ज़कात की अदायगी से माल में ख़ैर व बरकत की ज़्यादती और पाकिज़गी हो जाती है। इसलिए ऐसा माल जो ज़ाहिर और पाकीज़गी का ज़रिया बनता है उसे ज़कात कहा जाता है।
शरई ऐतबार से ज़कात माल का वह हिस्सा है जो अल्लाह तआला ने गरीबों, मिस्कीनों और ज़रूरतमन्दों के लिए मुक़र्रर कर दिया है। जो साल गुज़रने के बाद मुक़र्ररा निसाब की माल के मुताबिक़ मोहताजों को दिया जाता है।
ज़कात भी नमाज़ों की तरह फ़र्ज़ है। क्योंकि अल्लाह तआला ने ज़कात को नमाज़ के बाद बहुत बड़ी इबादत और दीनी फ़रीजा क़रार दिया है।
क़ुरआन शरीफ़ में जगह जगह नमाज़ के साथ ही ज़कात की अदाएगी का हुक्म दिया और प्यारे महबूब “ﷺ” ने भी ज़कात को दीने इस्लाम की बुनियाद क़रार दिया है।
📚 फ़ैज़ान ए शरीअत, ज़कात का बयान, सफ़ा 321
✒️✒️मिन जानिब :- इल्म की रौशनी
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Zakat Dene Ki Fazilat Wa Sawab Na Dene Par Waeed Wa Azaab
Zakat Ka Bayan
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