ज़कात का बयान
ज़कात की हक़ीक़त
➡️ ज़कात की हक़ीक़त शुकराने नेअमत है। जो इस जिंस की नेअमत के साथ अदा की जाए चूंकि सेहत व तन्दुरुस्ती भी अल्लाह तआला की बहुत बड़ी नेअमत है। लिहाज़ा जिस्म के हर अज़ु की ज़कात ज़रुरी है। और उस की सूरत ये है कि अपने तमाम अअज़ा को इबादत में मशग़ुल रखा जाए। किसी खेल कूद में ना लगाया जाए, ताकि इस तरह से सेहत व जिस्म की ज़कात का भी हक़ अदा हो जाए। औलमा ए ज़ाहिर बीं ने बग़र्ज़ तजर्बा हज़रत शिबली رحمۃ اللہ علیہ से दरयाफ़त किया कि कितनी मिक़दार पर ज़कात वाजिब है? आप ने फ़रमाया, जब बख़ील के पास 200 दिरहम माल मौजूद हो तो तुम्हारे तरीक़ा में 5 दिरहम और 20 दिनार पर निस्फ़ दिनार ज़कात वाजिब है। लेकिन हमारे तरीक़ा में किसी चीज़ को अपनी मिलकियत में ना रखना वाजिब है ताकि ज़कात की मशग़ुलीयत से बे परवाह हो जाए। उस आलिम ने पूछा, इस मसला में आप का इमाम और रहनुमा कौन है? आप ने फ़रमाया हज़रत ए सिद्दिक़ ए अकबर رضی اللہ تعالٰی عنہ हैं के उन्होंने जो मौजूद था सब दे दिया। हुज़ूर “ﷺ” ने इरशाद फ़रमाया तुम ने अपने घर वालों के लिए क्या छोड़ा? अर्ज़ किया अल्लाह ﷻ और उसके रसूल “ﷺ” को छोड़ा है।
*अमिरुल मौअमेनिन हज़रत ए अली رضی اللہ تعالٰی عنہ ने अपने एक क़सीदा में फ़रमाया, मुझ पर कभी ज़कात वाजिब ना हुवी, क्या सख़ी पर भी ज़कात वाजिब होती है। क्योंकि सख़ी का माल ख़र्च होता रहता है, वह माल राहे ख़ुदा में ख़र्च करने से कंजूसी नहीं करते, उन के पास माल जमा ही नहीं होता कि उन को ज़कात देना पडे।*
📚कशफ़ुल महबूब
📚 फ़ैज़ान ए शरीअत, ज़कात का बयान, सफ़ा 321-322
✒️✒️ मिन जानिब :- इल्म की रौशनी
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