मुहर्रम में क्या जाइज़? क्या नाजाइज़?
(पार्ट 15)
📋 बरेली शरीफ़ की ताज़ियेदारी......1
कुछ लोग ये भी कहते सुने गए हैं कि ताज़ियादारी अगर नाजाइज़ व हराम है तो बरेली शरीफ़ जहाँ आला हज़रत अहमद रज़ा खां बरेलवी علیہ الرحمتہ و الرضوان पैदा हुए और रहे वहाँ ताज़ियादारी क्यों होती है, तो उनकी ये दलील सही नहीं। दुनियां में सब जगह सब तरह के लोग रहते हैं उलमा ए किराम की बातें मानने वाले भी हैं और न मानने वाले भी, फ़रमाबरदार भी हैं और नाफ़रमान भी, बरेली शरीफ़ में एक ताज़ियादारी ही नहीं बहुत से ग़लत काम होते हैं, शराब नोशी, जुएबाजी, सूदख़ोरी, नाच तमाशे, बदकारी बेहयाई, बेपर्दगी, सिनेमा और पिक्चर बाजी, तो क्या उन सब की ज़िम्मेदारी आला हज़रत के सर डाली जाएगी?
उलमा ए किराम की ज़िम्मेदारी समझाना है दिल में डालना अल्लाह का काम है और ताक़त से रोकना अहले सल्तनत व हुक़ूमत का काम है, आला हज़रत तो आलिमे दीन और नाइबे रसूल हैं। नबियों और रसूलों के ज़माने में भी उनकी बस्तियों में बड़ी तादाद नाफ़रमान और सरकशों की रही है हज़रत ए नूह علیہ السلام की बीवी और उनके बेटे और हज़रत ए लूत علیہ السلام की बीवी की सरकशी और नाफ़रमानी का ज़िक्र तो ख़ुद क़ुरआन ए करीम में अल्लाह तआला ने फ़रमाया है, ख़ुद इमाम ए आली मक़ाम हुसैन رضی اللہ تعالٰی عنہ के ज़माने में उनके साथ क्या किया गया कलमा पढ़ने वालों ने ही उन्हें कैसा धोका दिया, और जंग करके शहीद कर डाला और सारा कूफ़ा मुख़ालिफ़ बन गया, तो अगर बरेली शरीफ़ के कुछ लोग आला हज़रत के ख़िलाफ़ चलते हैं तो उसमें कौनसी नई बात है और कौनसा तअज़्जुब का मक़ाम है।
हाँ ये बताइए कि आला हज़रत علیہ الرحمتہ و الرضوان ने कभी ताज़ियादारी को जाइज़ कहा हो या उसकी इजाज़त दी हो तो ये आप कभी साबित नहीं कर सकते, क्योंकि उन्होंने हमेशा उसकी मुख़ालिफ़त की, जो आज भी उनकी किताबों से ज़ाहिर है, और उनकी औलाद के क़िरदार, तरीक़ा-ए-कार से। खानवादे के हज़रात आज भी ताज़ियादारी के मुख़ालिफ़ हैं, इसमें न कभी शरीक़ होते हैं न उसे चंदा देते हैं, बल्कि उनसे जहाँ तक मुमकिन है रोकने की कोशिश करते हैं, और बरेली शरीफ़ में जो अहले सुन्नत के दारुलइफ़्ता हैं उनमें से किसी भी दारुलइफ़्ता से ताज़ियादारी के नाजाइज़ व हराम होने का फ़तवा आज भी आसानी से लिया जा सकता है, ताज़ियेदार फ़तवा तो कभी लेते ही नहीं और झूंठे प्रोपगंडे करते फ़िरते हैं।
जारी है........
📚 मुहर्रम मे क्या जाइज़? क्या नजाइज़?, सफ़ा 34 — 36
✍🏻 मौलाना तत्हीर अहमद रज़वी बरेलवी
✒️✒️ मिन जानिब :- इल्म की रौशनी
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