मुहर्रम मे क्या जाइज़? क्या नजाइज़?
(पार्ट 23)
📋 चहल्लुम का बयान
सफ़र के महीने की 20 तारीख़ को हज़रत ए सय्यदिना इमाम ए हुसैन رضی اللہ تعالٰی عنہ के चहल्लुम ने नाम पर भी ख़ूब मेले ठेले और तमाशे लगाए जाते हैं। ताज़िये बना कर बाजो ताशों के साथ घुमाए जाते हैं।
इस सिलसिले में पहली बात तो ये है कि चहल्लुम या चालीसवां उन न्याज़ व फ़ातिहा व ईसाले सवाब को कहते हैं जो इंतेक़ाल के चालीसवें दिन या कुछ आगे पीछे किया जाए। लेकिन जिस की शहादत को 1350 सौ साल हो चुकें हों उसका चहल्लुम अब होना समझ में नहीं आता, उर्स व बरसी तो हर साल होते हैं, लेकिन चालीसवां या चहल्लुम हर साल होना तअज़्जुब की बात है, फ़िर भी चूंकि न्याज़ व फ़ातिहा वग़ैरह जाइज़ काम हर दिन जाइज़ व हलाल है, 20 सफ़र को भी किए जाएं तो गुनाह नहीं बल्कि सवाब है, लेकिन चहल्लुम के नाम पर जो भी ख़ुराफ़ातें और तमाशे होते है उनसे इस्लाम मज़हब का दूर का भी वास्ता नहीं है।
बात दर असल ये है कि जब एक मेले और तमाशे से पेट नहीं भरा तो मौज़ व मस्ती और चन्दे करने के लिए एक दिन और बढ़ा लिया, क्योंकि खेल तमाशे ऐसी चीज़ें हैं कि तमाशा पसन्द लोग चाहते हैं कि ये तो रोज़ाना हों तो और भी अच्छा है, और नमाज़ रोज़े वग़ैरह क़ुरआन की तिलावत में उन्हीं का ध्यान लगता है जो ख़ुदा से डरते हैं और आख़िरत व मौत की फ़िक्र रखते हैं।
ख़ुलासा ये है कि मैं तो इस चहल्लुम का मतलब यही समझा कि हज़रत ए इमाम ए हुसैन رضی اللہ تعالٰی عنہ की यादगार मनाने का बहाना बनाकर खेल तमाशों ढ़ोल बाजो के लिए एक दिन और बढ़ा लिया गया है। कुछ लोग इस महीने को चहल्लुम का महीना कहकर मुहर्रम के अलावा इस महीना में भी निकाह और शादी को बुरा जानते हैं हांलाकि ब्याह शादी हर महीने में जाइज़ हैं। मुहर्रम और सफ़र में भी।
जारी है......
📚 मुहर्रम मे क्या जाइज़? क्या नजाइज़?, सफ़ा 43 - 44
✍🏻 मौलाना तत्हीर अहमद रज़वी बरेलवी
✒️✒️ मिन जानिब :- इल्म की रौशनी
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Chahallum Ka Bayan Part 23
40 Chahallum Ka Bayan
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