हैज़ व निफ़ास के मुतल्लिक़ अहकाम, मसाइल
(पार्ट 4)
➡️ हैज़ पूरे दस (10) दिन पर और निफ़ास पूरे चालीस (40) दिन पर ख़त्म हुआ और नमाज़ के वक़्त में अगर इतना भी बाक़ी हो कि अल्लाहु अकबर का लफ़्ज़ कहे तो उस वक़्त की नमाज़ उस पर फ़र्ज़ हो गई, नहा कर उसकी क़ज़ा पढ़े और अगर उससे कम में बंद हुआ और इतना वक़्त है कि जल्दी से नहा कर और कपड़े पहन कर एक बार अल्लाहु अकबर कह सकती है तो फ़र्ज़ हो गई क़ज़ा करे वरना नहीं।
➡️ अगर पूरे दस (10) दिन पर पाक हुई और उतना वक़्त रात का बाक़ी नहीं कि एक बार अल्लाहु अकबर कह ले तो उस दिन का रोज़ा उसपर वाजिब है और जो कम में पाक हुई और उतना वक़्त है कि सुबह सादिक़ होने से पहले नहा कर कपड़े पहन कर अल्लाहु अकबर कह सकती है तो रोज़ा फ़र्ज़ है, अगर नहा ले तो बेहतर है वरना बे नहाए नियत कर ले और सुबह को नहा ले और जो इतना वक़्त भी नहीं तो उस दिन का रोज़ा फ़र्ज़ न हुआ, अल्बता रोज़ादारों की तरह रहना वाजिब है, कोई बात ऐसी जो रोज़े के ख़िलाफ़ हो मसलन खाना, पीना हराम है।
➡️ रोज़े की हालत में हैज़ या निफ़ास शुरू हो गया तो वह रोज़ा जाता रहा उसकी क़ज़ा रखे, फ़र्ज़ था तो क़ज़ा फ़र्ज़ है और नफ़्ल था तो क़ज़ा वाजिब।
➡️ हैज़ व निफ़ास की हालत में सजदा शुक्र व सजदा तिलावत हराम है और आयत ए सजदा सुनने से उसपर सजदा वाजिब नहीं।
➡️ सोते वक़्त पाक थी और सुबह सोकर उठी तो असर हैज़ का देखा तो उसी वक़्त से हैज़ का हुक्म दिया जाएगा, ईशा की नमाज़ नहीं पढ़ी थी तो पाक होने पर उसकी क़ज़ा फ़र्ज़ है।
जारी है.....
📚 बहार ए शरीअत, जिल्द 1, हिस्सा 2, सफ़ा 381 - 382
✒️✒️ मिन जानिब :- इल्म की रौशनी
Haiz Wa Nifas Ke Mutalliq Ahkam Aur Masail Part 4
0 Comments