Muharram Mein Kya Najaiz? Taziyadari Part 8

 मुहर्रम में क्या जाइज़? क्या नाजाइज़?

 (पार्ट 9) 

📋 मुहर्रम में क्या नाजाइज़ ?.......1

ताज़ियेदारी :- 

आज कल जो ताज़िये बनाये जाते हैं, पहली बात तो ये हज़रत इमाम आली मक़ाम के रोज़ा का सही नक़्शा नहीं है, अज़ीब अज़ीब तरह के ताज़िये बनाये जाते हैं, फ़िर उन्हें घुमाया और गश्त कराया जाता है, एक दूसरे से मुक़ाबिला किया जाता है, और उस मुक़ाबिले में कभी कभी लड़ाई झगड़े और लाठी डंडे चाकू और छुरी चलाने की नौबत आ जाती है, और ये सब हज़रत इमाम ए हुसैन رضی اللہ تعالٰی عنہ की मुहब्बत के नाम पर किया जाता है। अफ़सोस इस मुसलमान को क्या हो गया  और ये कहाँ से चला था और कहां पहुँच गया, कोई समझाये तो मानने को तय्यार नहीं, बल्कि उल्टा समझाने वाले को बुरा भला कहने लगता है।


ख़ुलासा ये है कि आज की ताज़िये और इसके साथ होने वाली तमाम बिदआत व ख़ुराफ़ात व वाहियात सब नाजाइज़ व गुनाह है, मसलन मातम करना, ताज़िये पर चढ़ावे चढ़ाना उनके सामने खाना रखकर वहाँ फ़ातिहा पढ़ना, उनसे मन्नत मांगना, उनके नीचे से बरकत हासिल करने के लिए बच्चों को निकालना, ताज़िये देखने कोे जाना, उन्हें झुककर सलाम करना, सवारियाँ निकालना, सब जाहिलाना बातें और नाजाइज़ हरकतें हैं, उनका मज़हबे इस्लाम से कोई वास्ता नहीं, और जो इस्लाम को जानता है उसका दिल ख़ुद कहेगा कि इस्लाम जैसा सीधा और शराफ़त व संजीदगी वाला मज़हब उन तमाशों और वहम परस्ती की बातों को कैसे गवारा कर सकता है?


कुछ लोग कहते हैं कि ताज़िये और उसके साथ साथ ढोल बाजे और मातम करते हुए घूमने से इस्लाम और मुसलमानों की शान ज़ाहिर होती है। ये एक फ़ुज़ूल बात है, पांचों वक़्त की अज़ान और मुहल्ले बस्ती और शहर के सब मुसलमानों का मस्जिदों और ईदगाहों में जुमा और ईद की नमाज़ बा जमाअत अदा करने से ज़्यादा मुसलमानों की शान ज़ाहिर करने वाली कोई और चीज़ नहीं। ताज़िये और उसके तमाशों, ढोल बाजों और कूदने फ़ांदने, मातम करने और बुज़ुर्गों के नाम पर ग़ैर शरई उर्सों, मेलों और आज की क़व्वालियों की महफ़िलों को देखकर तो ग़ैर मुस्लिम ये समझते हैं कि इस्लाम भी हमारे मज़हब की तरह तमाशाई मज़हब है, बजाये सुधरने और इस्लाम की तरफ़ आने के और चिढ़ते हैं, और कभी कभी उस ताज़िये की वजह से लड़ाई झगड़े और ख़ूनरेज़ी की नौबत आती है, और बे वजह मुसलमानों का नुकसान होता है, और नमाज़, रोज़ा, ईमानदारी और सच्चाई, अहकामे शरअ की पाबंदी और दीनदारी को देखकर ग़ैर मुस्लिम भी कहते हैं कि वाक़ई मज़हब है तो बस इस्लाम है ये और बात है कि वो किसी वजह से मुसलमान न बने, लेकिन इस में भी कोई शक़ नहीं कि बहुत से ग़ैर मुस्लिमों क़ा दिल मुसलमान होने को चाहता है और कुछ हो भी जाते है, और होते रहे हैं। देखते नहीं हो कि दुनियां में कितने मुसलमान हैं और सिर्फ़ 1400 साल में उनकी तादाद कहाँ से कहाँ पहुँच गई, ये सब नमाज़, रोज़े और इस्लाम की भोली, सीधी, सच्ची बातों को देख कर हुए हैं, ताज़िये और उसके साथ मेलों ठेलों और तमाशों को देखकर न कोई मुसलमान हुआ, और न अब होता है। और ताज़िये से इस्लाम की शान ज़ाहिर नहीं होती बल्कि मज़हबे इस्लाम की बदनामी होती है।


कुछ लोग मुहर्रम के दिनों में बजने वाले बाजों को ग़म का बाजा बताते हैं उन्हें मालूम होना चाहिए कि गम के मौके पर बाजे नहीं बजाए जाते और ग़म मनाना भी तो इस्लाम में जाइज़ नहीं है। ये इमाम ए हुसैन رضی اللہ تعالٰی عنہ की दर्दनाक शहादत के नाम पर बाजे बजाने वालों से मैं पूछता हूँ कि जब उनके यहाँ कोई हादसा हो जाए या कोई मरजाये तो क्यों बाजे नहीं बजाते और बेंड मास्टर को क्यों नहीं बुलाते, नाच कूद और तमाशे क्यों नहीं करते, और जो मौलवी साहब मुहर्रम में बाजे बजाने को जाइज़ कहते हैं जब ये मरें या उनके घर में कोई मरे तो उनकी मौत पर और फ़िर तीजे, दसवें, चालीसवें और बरसी पर महंगा वाला बैंड लाया जाए जो मौलवी साहब के शायाने शान हो। और चूंकि उनके यहाँ ये सब सवाब का काम है लिहाज़ा उनकी रूह को इसका सवाब भी जरूर पहुँचाया जाए।


📚 मुहर्रम में क्या जाइज़? क्या नाजाइज़? , सफ़ा 

 17 — 20


✍🏻 मौलाना तत्हीर अहमद रज़वी बरेलवी


✒️✒️ मिन जानिब :- इल्म की रौशनी


Follow this link to join my WhatsApp group: https://chat.whatsapp.com/BJNhO3LXmNjGjGO6P0Lgs1



*Join Our Telegram group*


ILM KI RAUSHNI

https://t.me/ILMKIRAUSHNI


Muharram Mein Kya Najaiz? Taziyadari Part 8

Post a Comment

0 Comments