Muharram Mein Kya Najaiz? Taziyadari Part 10

 मुहर्रम में क्या जाइज़? क्या नाजाइज़? 

(पार्ट 10) 

📋 मुहर्रम में क्या नाजाइज़? ........2

ताज़ियेदारी :-

बाअज़ लोग कहते हैं कि हमारे ख़ानदान में ताज़िये पहले से होती चली आ रही है, एक साल हमने ताज़ियेदारी नहीं बनाया तो हमारा फ़लां नुक़सान हो गया या बीमार हो गए या घर में कोई मर गया, ये भी जाहिलाना बातें हैं पहले तो ऐसा होता नहीं और हो भी जाए तो ये एक शैतानी चाल है वो चाहता है कि तुम हराम कारियों में लगे रहो, और ख़ुदा और रसूल “ﷺ” से दूर रहो, हो सकता है कि शैतान आप को डिगाने के लिए कुछ कुछ कर देता हो, क्योंकि कुछ ताक़त अल्लाह ने उसको भी दी है, और अल्लाह की ज़ात तो ग़नी है सब से बे परवाह है अगर सब सुधर जाएं नेक और परहेज़गार हो जाए तो उसे कुछ नफ़ा और फ़ायदा नहीं पहुंचता और सब बिगड़ जाए तो उसका कुछ घाटा नहीं होता, इंसान अच्छा करता है तो अपने अच्छे के लिए और बुरा करता है तो अपने बुरे के लिए और मुसलमान का अक़ीदा व ईमान इतना मजबूत होना चाहिए कि दुनियां का नफ़अ हो या नुक़सान हम तो वही करेंगे जिस से अल्लाह व रसूल “ﷺ” राज़ी हो, और घाटे नफ़अ को भी अल्लाह ही जानता है हम कुछ नहीं जानते, कभी किसी चीज़ में हम फ़ायदा समझते हैं और घाटा हो जाता है और कभी घाटा और नुक़सान ख़्याल करते है मगर नफ़अ और फ़ायदा निकलता है। एक शख़्स को मुद्दत से एक गाड़ी ख़रीदने की तमन्ना थी और जब ख़रीदी तो पूरी फ़ैमली के साथ इस गाड़ी में एक्सीडेंट के ज़रिए मारा गया। ख़ुलासा ये है कि अपने सब काम अल्लाह की मर्ज़ी पर छोड़ दीजिए, और उसके बताये हुए रास्ते पर चलना ज़िन्दगी का मक़सद बना लीजिए फ़िर जो होगा देखा जाएगा। और वही होगा जो अल्लाह चाहेगा।


कुछ लोग कहते हैं कि ताज़िया और तख़्त बनाना सजाना ऐसा ही है जैसे जलसे, जुलूस, और मीलाद की महफिलों के लिए शामयाने पिंडालों, सड़कों, गलियों और घरों को सजाया जाता है। तो ये भी एक ग़लतफ़हमी है, जलसा, जुलूस, और महफ़िलों में सजाबट और डेकोरेशन असल मक़सद नहीं होता, ज़िक्रे ख़ैर वअज़ व तब्लीग और तक़रीर मक़सूद होता है उसके लिए ये सजाबटें होती हैं, और ताज़िया बनाने का मक़सद सिवाए, सवारने और घुमाने के और क्या है? और जलसे, जुलूस, और महफ़िलों के लिए भी हद से ज़्यादा बे ज़रूरत इतना डेकोरेशन और सजाबट करना कि आने वालों का ध्यान उसी में लग कर रह जाए और वही मक़सद बनकर रह जाए और ज़िक़्र ख़ैर वअज़ व तब्लीग की तरफ़ से तवज्जो हट जाए ये सब करना भी अच्छा नहीं है, और उन सब सजावटों में भी आपस में मुक़ाबिले और फ़ख्र व मुबाहत ख़िलाफ़े शरअ बातें हैं। ख़ासकर गरीबों मज़दूरों से जबर्दस्ती चंदे लेकर ये सब काम ज़्यादती है, बजाए सवाब के गुनाह भी हो सकता है, क्योकि गरीबों को सताना इस्लाम में ज़्यादा बुरा काम है।


महफ़िलें, मजलिसे कभी कभी बग़ैर सजावट और डेकोरेशन के भी होती हैं और ताज़िया तो सजावट ही का नाम है ये ना हो तो फ़िर ताज़िया ही कहाँ रहा?


कुछ लोग कहते हैं कि ताज़ियेदारी ख़त्म हो गई तो इमाम ए हुसैन رضی اللہ تعالٰی عنہ का नाम मिट जाएगा तो ये भी उन लोगों की ग़लतफ़हमी हैं, हज़रत ए इमाम ए हुसैन رضی اللہ تعالٰی عنہ का नाम तो दुनियां की लाखों मस्जिदों में हर जुमा की नमाज़ से पहले ख़ुत्बे में पढ़ा जाता है। पीरी मुरीदी के अक्सर सिलसिले उनसे होकर रसूले ख़ुदा तक पहुंचते हैं, और जब शजरे पढ़े जाते हैं तो इमाम ए हुसैन رضی اللہ تعالٰی عنہ का नाम आता है, क़ुरआने करीम के 22वें पारे के पहले रूकूअ में जो आयते ततहीर है उसमें भी अहले बैत का ज़िक्र मौजूद है और तो और ख़ुद नमाज़ जो अल्लाह की इबादत है उसमें भी आले मुहम्मद पर दुरूद पढ़ा जाता है “ﷺ” उसके अलावा कितने जलसों, जुलूसों महफ़िलों, मजलिसों, नारों, नज़्मों, में उनका नाम आता है, ये सब दुनिया जानती है मेरे बताने की ज़रूरत नहीं और सही बात ये है कि इमाम ए हुसैन رضی اللہ تعالٰی عنہ का नाम तो हर मुसलमान के दिल में अल्लाह तआला ने लिख दिया है, और जिस के दिल में इमाम ए हुसैन رضی اللہ تعالٰی عنہ का नाम नहीं वो मुसलमान कहलाने का हक़दार नहीं। तो भाइयों! जिस का ज़िक्र नमाज़ों में, ख़ुत्बों में, क़ुरआन की आयतों में, और हज़ारों महफ़िलों मजलिसों और ख़ानकाही शजरों में हो उसका नाम कैसे मिट जाएगा। ताज़ियेदारी और उसके साथ जो तमाशे होते हैं उससे तो हज़रत ए इमाम पाक رضی اللہ تعالٰی عنہ का नाम बदनाम किया जाता है।


जो लोग कहते हैं कि ताज़ियेदारी ख़त्म हो गई तो इमाम ए हुसैन رضی اللہ تعالٰی عنہ का नाम मिट जाएगा मैं उनसे पूछता हूं कि हज़रत ए इमाम पाक رضی اللہ تعالٰی عنہ से पहले और बाद में जो हज़ारों लाखों हज़रात ए अम्बिया व औलिया व शोहदा हुए हैं उनमें से किस किस के नाम ताज़ियेदारी या मेले तमाशे होते हैं? क्या उन सबके नाम मिट गए? हक़ ये है कि ताज़ियेदारी ख़त्म होने से इमाम ए हुसैन رضی اللہ تعالٰی عنہ का नाम नहीं मिटेगा बल्कि ताज़ियेदारों का नाम मिट जाएगा और आजकल ताज़ियेदारी अपने नाम के लिए ही हो रही है इमाम ए हुसैन رضی اللہ تعالٰی عنہ के नाम के लिए नहीं। देखा नहीं ये ताज़ियेदार अपनी नामवरी (नाम के लिए) कि मेरा ताज़िया सब से ऊंचा, सबसे अच्छा रहे और आगे चले उसके लिए कैसे कैसे झगड़े करते हैं, ख़ुद भी लड़ते मरते हैं और औरों को भी मरवाते हैं। 

📚 मुहर्रम में क्या जाइज़? क्या नाजाइज़? , सफ़ा 20 —23

✍🏻 मौलाना तत्हीर अहमद रज़वी बरेलवी

✒️✒️ मिन जानिब :- इल्म की रौशनी


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