क़ुर्बानी का बयान (पार्ट 31)
तम्बीह
क़ुर्बानी के मसाइल तफ़सील के साथ मज़कुर हो चुके अब मुख़्तसर तौर पर उसका तरीक़ा बयान किया जाता है ताकि आवाम के लिए आसानी हो।
क़ुर्बानी का जानवर उन शरायत के मुआफ़िक़ हो जो मज़कुर हुएं यानी जो उसकी उम्र बतायी गई उससे कम ना हो और उन अयुब से पाक हो जिनकी वजह से क़ुर्बानी नाजायज़ होती है और बेहतर ये कि उम्दा और फ़रबा हो। क़ुर्बानी से पहले उसे चारा पानी दे दें यानी भूखा प्यासा ज़बह ना करें ।और एक के सामने दूसरे को ज़बह ना करें और पहले से छुरी तेज़ कर लें ऐसा ना हो कि जानवर गिराने के बाद उसके सामने छुरी तेज़ की जाए। जानवर को बाएं पहलू पर इस तरह लिटाएं कि क़िब्ला को उसका मुँह हो और अपना दाहिना पावं उसके पहलू पर रख कर तेज़ छुरी से जल्द ज़बह कर दिया जाए और ज़बह से पहले ये दुआ पढ़ी जाए
اِنِّیْ وَجَّھْتُ وَجْھِیَ لِلَّذِیْ فَطَرَ السَّمٰوٰتِ وَالْاَرْضَ حَنِیْفًا وَّمَا اَنَا مِنَ الْمُشْرِکِیْنَ اِنَّ صَلَاتِیْ وَنُسُکِیْ وَمَحْیَایَ وَمَمَاتِیْ لِلّٰهِ رَبِّ الْعٰلَمِیْنَ لا شَرِیْکَ لَهٗ وَ بِذٰلِکَ اُمِرْتُ وَ اَنَا مِنَ الْمُسْلِمِیْنَ اَللّٰھُمَّ لَكَ وَمِنْکَ بِسْمِ اللّٰهِ اَللّٰهُ اَکْبَرُ.
इसे पढ़ कर ज़बह कर दे। क़ुर्बानी अपनी तरफ़ से हो तो ज़बह के बाद ये दुआ पढ़े
اَللّٰھُمَّ تَقَبَّلَ مِنِّى كَمَا تَقَبَّلْتَ مِنْ خَلِيْلِكَ اِبْرَاهِىْمَ عَلَيْهِ السَّلَامُ وَ حَبِيْبِكَ مُحَمّدٍ.
صلَّى اللّٰهُ تعلٰى عليه وسلَّم.
इस तरह ज़बह करे कि चारों (4) रगें कट जाए या कम से कम तीन (3) रगें कट जाएं।उससे ज़्यादा न काटें कि छूरी गर्दन के मुहरा तक पहुंच जाए कि ये बेवजह की तकलीफ़ है फ़िर जब तक जानवर ठंडा न हो जाए यानी जब तक उसकी रूह बिल्कुल न निकल जाए उसके न पाँव वग़ैरह काटें न खाल उतारें और अगर दूसरे की तरफ़ से ज़बह करता है तो مِنِّى की जगह مِنْ के बाद उसका नाम ले। और अगर वो मुशतरीक जानवर है जैसे गाय ऊँट तो वजन से गोश्त तक़सीम किया जाए महज़ तख़मीना (अन्दाज़ा) से तक़सीम न करें। फ़िर उस गोश्त के तीन (3) हिस्से करके एक हिस्सा फ़ुक़रा पर तसद्दुक़ (सदक़ा कर दे) करे और एक हिस्सा दोस्त व अहबाब के यहां भेजे और एक अपने घर वालों के लिए रखे और उसमें से ख़ुद भी कुछ खा ले और अगर अहलो अयाल ज़्यादा हों तो तिहाई से ज़्यादा बल्कि कुल गोश्त भी घर के सर्फ़ (इस्तेमाल) में ला सकता है। और क़ुर्बानी का चमड़ा अपने काम में भी ला सकता है और हो सकता है कि किसी नेक काम के लिए दे दे मसलन मस्जिद या दीनी मदरसा को दे दे या किसी फ़क़ीर को दे दे। बाअज़ जगह ये चमड़ा इमाम मस्जिद को दिया जाता है अगर इमाम की तनख़्वाह में न दिया जाता हो बल्कि इआनत के तौर पर हो तो हर्ज नहीं। बहरुलराइक़ में मज़कूर है कि क़ुर्बानी करने वाला बक़रईद के दिन सबसे पहले क़ुर्बानी का गोश्त खाए उससे पहले कोई दूसरी चीज़ न खाए ये मुस्तहब है उसके ख़िलाफ़ करे जब भी हर्ज नहीं।
📚 बहार ए शरीअत, जिल्द 3, हिस्सा 15, सफ़ा 352 - 353
जारी है.....
✒️✒️ मिन जानिब :- इल्म की रौशनी
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