मुहर्रम मे क्या जाइज़, क्या नजाइज़?
(पार्ट 12)
📋 ताज़ियेदारी लड़ाई झगड़े की बुनियाद.......2
मज़हब मख़लूक़ की मुश्किलात को दूर करने का नाम है उन्हें परेशान करना और मुश्किलात में डालना मज़हब नहीं हैं, जब सड़के जाम होती हैं तो किस किस को कैसी मुसीबत और परेशानी का सामना करना पड़ता है ये सबको ख़ूब पता है, लेकिन धर्म के ठेकेदारों का धर्म आज कल उस वक़्त तक मुकम्मल नहीं होता जब तक कि वो पब्लिक का ख़ून न पी लें।
दुसरे लोग अपने धर्मों के नाम पर क्या करते हैं उसके ज़िम्मेदार तो वो हैं लेकिन हमें उनकी शरीकी नहीं करना चाहिए, और अपने मज़हब की असली शक़्ल दुनियां के सामने लाना चाहिए, हमारे मज़हब में किसी को सताने की कोई गुंजाइश नहीं, राहगुज़र तंग करना या बन्द करना या राहगीरों, मुसाफ़िरों को परेशान करना बड़ा ज़ुल्म व ज़्यादती है। इमाम ए हुसैन رضی اللہ تعالٰی عنہ के मानने वालों को तो ऐसा कभी भी नहीं करना चाहिए, क्योंकि उन्होंने दूसरों को यज़ीदी मज़ालिम से बचाने के लिए ही अपना गला कटाया था और आप उनका नाम लेकर ही दूसरों पर ज़ुल्म करते हैं और उनके लिए मुसीबत बन जाते हैं।
कुछ लोग कहते हैं कि ताज़ियादारी अगर हराम है तो मौलवी पहले भी तो थे उन्होंने मना क्यों नहीं किया, तो मेरे भाइयों! बात ये है कि ताजियेदारी शुरू होने के बाद धीरे धीरे नाजाइज़ कामों पर मुश्तमिल होती चली गई और जब से ये ख़िलाफ़े शरअ हरकात व खुराफ़ात का मजमुआ बनी है, उलमा ए दीन बराबर उसको हराम कहते और लिखते रहे, जैसा कि आने वाले बयान से आपको मालूम होगा। और हर ज़माने में मानने वाले भी रहे हैं और न मानने वाले भी, और मौलवी भी सब अल्लाह से डरने वाले नहीं होते मख़लूक़ से डरने वाले और लोगो की हां में हां मिलाने वाले कुछ मौलवी पहले भी रहे हैं, और अब भी हैं और आज के मस्जिदों के इमामों का किसी ख़िलाफ़े शरअ बात को देखकर कुछ न कहना कोई मअना नहीं रखता क्योंकि इमामत तो अब नौकरी व गुलामी सी हो कर रह गई है, अगर एक आदमी भी नाराज़ हो जाए तो इमामत ख़तरे में पड़ जाती है। लेकिन फ़िर भी मेरी गुज़ारिश है कि हिम्मत से काम लेना चाहिए और सही बात लोगो को बताना चाहिए छुपाना नहीं चाहिए, अल्लाह तआला उनकी मदद फ़रमाता है जो उसके दीन की मदद करते हैं।
मौलवियों में आज कुछ ऐसे भी हैं जिन के पेट अल्लाह ने भर दिए हैं लेकिन ये बहुत ज़्यादा माल व दौलत शान व शौकत हासिल करने के लिए दींन को नुक़्सान पहुंचाते हैं ग़लत बयानी करते हैं हक़ को छुपाते हैं और ये नहीं जानते हैं कि इज़्ज़त व दौलत अल्लाह के दस्ते कुदरत में है, जिसे जब चाहे अता फ़रमाए ये मौत को भूल गए हैं लेकिन मौत इन्हें नहीं भूलेगी ।
जारी है..........
📚 मुहर्रम मे क्या जाइज़? क्या नजाइज़?, सफ़ा 25 —27
✍🏻 मौलाना तत्हीर अहमद रज़वी बरेलवी
✒️✒️ मिन जानिब :- इल्म की रौशनी
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