Zikre Shahadat Part 8

 मुहर्रम में क्या जाइज़? क्या नाजाइज़?

 (पार्ट 8) 

ज़िक्रे शहादत

हज़रत सय्यद इमाम ए हुसैन رضی اللہ تعالٰی عنہ और दूसरे हज़रात ए अहले बैअत ए किराम का ज़िक्र नज़्म में या नस्र में करना और सुनना यक़ीनन जाइज़ है, और बाइसे ख़ैर व बरकत व नुज़ूले रहमत है लेकिन इस सिलसिले में नीचे लिखी हुई बातों को ध्यान में रखना ज़रूरी है।

(1) ज़िक्रे शहादत में सही रिवायात और सच्चे वाक़ियात बयान किए जाए, आज कल कुछ पेशेवर मुक़र्रीरों और शायरों ने अवाम को ख़ुश करने और तक़रीरों को जमाने के लिए अज़ीब अज़ीब क़िस्से और अनोखी निराली हिकायात और गढ़ी हुई कहानियां और करामात बयान करना शुरू कर दिया है, क्योंकि अवाम को ऐसी बातें सुनने में मज़ा आता है, और आज कल के अक्सर मुक़र्रीरों को अल्लाह व रसूल से ज़्यादा अवाम को खुश करने की फ़िक्र रहती है, और बज़ाहिर सच से झूठ में मज़ा ज़्यादा है और जलसे ज़्यादातर अब मज़ेदारियों के लिए ही होते हैं।

आला हज़रत मौलाना शाह इमाम अहमद रज़ा رحمۃ اللہ علیہ फ़रमाते हैं:- 

शहादत नामे नज़्म या नस्र जो आज कल अवाम में राइज़ है अक्सर रिवायते बातिला व बे सरोपा से ममलू और अकाज़ीब मोज़ूआ पर मुश्तमिल है, ऐसे बयान का पढ़ना और सुनना, वो शहादत नामा हो, ख़्वाह कुछ और मजलिसे मीलाद मुबारक में हो ख़्वाह कहीं और मुतलक़न हराम व नाजाइज़ है।

📚 फ़तावा रज़विया जिल्द 24, सफ़ा 514, मतबूआ रज़ा फाउंडेशन लाहौर

और उसी किताब के सफ़ा 522 पर इतना और है:- 

यूँही मरसिये। ऐसी चीज़ों का पढ़ना सुनना सब गुनाह व हराम है।

हदीस पाक में है, हुज़ूर “ﷺ” ने मरसियों से मना फरमाया।

ज़िक्रे शहादत का मक़सद सिर्फ वाक़ियात को सुन कर इबरत व नसीहत हासिल करना हो और साथ ही साथ सालिहीन के ज़िक़्र की बरकत हासिल करना ही हो, रोने और रुलाने के लिए वाक़ियाते कर्बला बयान करना नाजाइज़ व गुनाह है।इस्लाम में 3 दिन से ज़्यादा मौत का सोग जाइज़ नहीं। 


आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा खां बरेलवी علیہ الرحمتہ و الرضوان फरमाते हैं:-

शरीयत में औरतों को शौहर की मौत पर चार महीने दस दिन सोग मनाने का हुक्म दिया है, औरों की मौत के तीसरे दिन तक इजाज़त दी है, बाक़ी हराम है, और हर साल सोग की तजदीद तो असलन किसी के लिए हलाल नहीं।


 📚 फ़तावा रज़विया जिल्द 24, सफ़ा 495)

और रोना रुलाना सब राफ़ज़ीयों के तौर तरीक़े हैं क्योंकि उनकी क़िस्मत में ही ये लिखा हुआ है। राफ़ज़ी ग़म मनाते हैं और ख़ारजी ख़ुशी मनाते हैं और सुन्नी, वाक़ियाते कर्बला से नसीहत व इबरत हासिल करते हैं और दीन की ख़ातिर कुर्बानियां देने और मुसीबतों पर सब्र करने का सबक लेते हैं और उनके ज़िक़्र से बरकत और फ़ैज़ पाते हैं।

हाँ अगर उनकी मुसीबतों को याद करके ग़म हो जाए या आँसू निकल आए तो ये मुहब्बत की पहचान है। मतलब ये है कि एक होता है ग़म मनाना और ग़म करना, और एक होता है ग़म हो जाना। ग़म मनाना और करना नाजाइज़ है और ध्यान आने पर ख़ुद बख़ुद हो जाए तो जाइज़ है।


जारी है......... 


📚 मुहर्रम में क्या जाइज़? क्या नाजाइज़? , सफ़ा 15 — 17


✍🏻 मौलाना तत्हीर अहमद रज़वी बरेलवी


✒️✒️ मिन जानिब :- इल्म की रौशनी


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