मुहर्रम में क्या जाइज़? क्या नाजाइज़?
(पार्ट 24)
📝 काले और हरे कपड़े पहनना या हरी टोपी ओढ़ना
मुह़र्रम में ये हरे काले कपड़े ग़म और सोग मनाने के लिए पहने जाते हैं और सोग इस्लाम में ह़राम है उसके ए़लावा सोग की और बातें भी कुछ राइज हैं, जैसे मुहर्रम में शुरू के दस दिन कपड़े न बदलना, दिन में रोटी न पकाना, झाड़ू न लगाना, माहे मुहर्रम में ब्याह शादी को बुरा समझना सब फ़ुज़ूल बातें और जिहालत व राफ़्ज़ियत की पैदावार ख़ुराफ़ातें हैं।
अ़ाला हज़रत علیہ الرحمتہ و الرضوان फ़रमाते हैं :-
यूँ ही अशरा-ए- मुहर्रम के सब्ज़ (हरे) रंगे हुए कपड़े भी नाजाइज़ हैं यह भी सोग की ग़र्ज़ से हैं... अशरा मुहर्रम में तीन रंगों से बचें स्याह (काला) सब्ज़ (हरा) सुर्ख़ (लाल) ।
📚 फ़तावा रज़विया जिल्द 24, सफ़ा 496
बाज़ जगह अशरा मुहर्रम में सवारियाँ निकाली जाती हैं और उनके साथ तरह तरह के तमाशे और ड्रामे होते हैं वो भी नाजाइज़ व गुनाह हैं।
खुदा ए तअ़ाला मुसलमानों को सही मअ़ना में इस्लाम को समझने और
उस पर चलने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।
भाइयों! यह दिल है उसको जिस में लगाओगे ये लग जाएगा, गानों, बाजों, मेलों, तमाशों, ख़ुराफ़ातों में लगाओगे तो उसमें लग जाएगा। और उसी दिल को नमाज़ रोज़े और क़ुरआन की तिलावत में लगाओगे तो उस में लग जाएगा।
अफ़सोस कि तुम ने अपने दिल को मेलो, ठेलों और तमाशों में लगा लिया। और मौत क़रीब आ रही है मरने से पहले इस दिल को नमाज़, रोज़े, क़ुरआन की तिलावत और दीनी किताबों के मुत़ाले वग़ैरह अच्छी बातों में लगा लो।
कई जगह ऐसा भी हुआ है कि कुछ ताज़ियेदारों की समझ में यह आ गया कि वाक़ई ताज़ियेदारी नाजाइज़ काम है तो वह मौलवियों और इमामों से कहते हैं कि ठीक है हम ताज़िये नहीं बनाएंगे लेकिन जलसा और कांफ्रेन्स कराओ फ़लाँ फ़लाँ मुक़र्रिरों और शाइ़रों को बुलवा दो, तो ये बात भी सही नहीं है, किसी ग़लत़ काम से तौबा करने और नेक बनने के लिए कोई शर्त नहीं लगाना चाहिए, पहले आप ताज़ियेदारी से तौबा कीजिए बाज़ रहिए उसके बाद कहिए अब क्या करना है।
आज कल के बहुत से जलसे भी मेरी नज़र में कोई दीन दारी के काम नहीं रह गए हैं, दोनों तरफ़ से ख़ालिस़ दुनियादारी बल्कि दुकानदारी बन गए हैं और जलसे हैं कहाँ जलसों के नाम पर ज़्यादा तर मुशाइ़रे हो रहे हैं और तक़रीरें भी अक्सर वो हैं जिनकी हैसियत शेर व शाइ़री से ज़्यादा नहीं।
मेरा मशवरा तो ये है कि दीन का ज़िम्मे दार ठेकेदार बनने की कोशिश करने के बजाए दीन दार बनने की कोशिश करो, जलसों और तक़रीरों के ज़रीए़े दूसरों की इस़्लाह़ करने की ज़्यादा फ़िक्र न करो, ख़ुद को संभाल और सुधार लो तो एक अ़ाम आदमी के लिए ये भी बहुत काफ़ी है, नमाज़, रोज़े के पाबन्द हो जाओ बुरे
कामों से बचो और अपने काम धन्धे करो।
दर असल मुसलमानों में काफ़ी लोग वो हैं कि जिन की तबीअतें तमाशा पसन्द हो गई हैं उन्हें हर वक़्त दुन्दखपाड़ और कोहराम चाहिए ऐसे न सही तो ऐसे और इस में न सही तो उस में कुछ लोग जो सच्चे पक्के दीन दार मुसलमान होते हैं उनके लिए नमाज़ रोज़ा कुरआन की तिलावत ज़िक्र व शुक्र हुज़ूर “ﷺ” पर दुरूद पढ़ना काफ़ी है, इन्हीं सब बातों से उनका दिल बहल जाता है।
असली मोमिनों की शान तो क़ुरआन में ये बयान की गई है :-
बेशक मुराद को पहुँचे ईमान वाले जो नमाज़ में गिड़गिड़ाते हैं और जो बेहुदा बातों की त़रफ़ तवज्जोह नहीं करते और वो जो ज़कात देने का काम करते हैं, और वो जो अपनी शर्मगाहों की ह़िफ़ाज़त करते हैं।
और यहीं थोड़ा आगे फ़रमाया जाता है :-
और वो जो अपनी अमानतों और अहद का लिहाज़ रखते हैं और जो अपनी नमाज़ों की ह़िफ़ाज़त करते हैं यही लोग वारिस हैं जो जन्नतुलफ़िरदौस की मीरास पायेंगे, और वह उस में हमेशा रहेंगे।
पारा 18, रुकुअ 1
ख़ुदा ए तअ़ाला से दुआ है कि वह नमाज़ व तिलावत ज़िक्र व शुक्र और अपने मह़बूब पर दुरूद व सलाम को हमारे दिल व जान और रुह़ों की ग़िज़ा बना दे और बेहूदा बातों खेल तमाशों से हमारे दिल हटा दे।
जारी है........
📚 मुहर्रम में क्या जाइज़? क्या नाजाइज़?, सफ़ा 44 — 47
✍🏻 मौलाना तत्हीर अहमद रज़वी बरेलवी
✒️✒️ मिन जानिब :- इल्म की रौशनी
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