इमाम ए अहले सुन्नत सय्यदी आला हज़रत علیہ الرحمتہ و الرضوان का मुख़्तसर ताअरुफ़
तीन अज़ीम इल्मी शाहकार :-
3. कंज़ुल ईमान फ़ी तर्जमा तिल क़ुरआन (1330 हीजरी)
हुज़ूर आला हज़रत علیہ الرحمہ का एक बड़ा कारनामा तर्जमा ए क़ुरआन है। मुतर्जम ए क़ुरआन में कंज़ुल ईमान इम्तियाज़ी शान रखता है। आप ने इश्क़ व मोहब्बत की ज़बान में क़ुरआने हकीम का एक फ़क़ीदुल मिसाल तर्जमा किया है। जो इल्मी व अदबी और एतेक़ादि हर हैसियत से मेअयारी है। और क़ुरआन मजीद की हक़ीक़ी झलक का आईनादार है।
ये तर्जमा : 1330 हिजरी / 1911 ई० में मुकम्मल हुआ। जिसका नाम “कंज़ुल ईमान फ़ी तर्जमा तिल क़ुरआन” रखा गया है।
ये फ़िल बदीह तर्जमा तफ़ासीर मोअतबरह के बिल्कुल मुताबिक़ और उनका तर्जुमान है। आज तक इस शान का कोई तर्जमा मनसा ए शहवद पर जलवगर नहीं हुआ। ये तमाम उर्दू तराजीम में आफ़दीयत व अहमियत का एतेबार से एक मुनफ़रीद और मुम्ताज़ हैसियत का हामिल है। इस के मुताअला से हुब्बे इलाही और इश्क़े रसूल “ﷺ” के जज़्बात उजागर होते हैं।
इस अज़ीमुश्शान व माएनाज़ तर्जमा ए क़ुरआन यानी कंज़ुल ईमान की इन्फिरादी ख़ुसूसियत के हवाले से एक एक़तेबास मुलाहिजा फ़रमाएं :-
ताजदारे अशरफ़ियत सय्यद मुहम्मद अशरफ़ मुहद्दिस ए आज़म علیہ الرحمہ ने शुरू से आख़िर तक बानज़र व फ़ीक़ व बक़ल्ब अमीक़ मुताअला करने के बाद फ़रमाया :-
“ इस कि कोई मिसाल अरबी ज़बान में ना है फ़ारसी ज़बान में और ना ही उर्दू ज़बान में, इसका एक एक लफ्ज़ अपने मक़ाम पर ऐसा है कि दूसरा अल्फ़ाज़ उस जगह पर लाया ही नहीं जा सकता। बज़ाहिर तो एक तर्जमा है मगर दर हक़ीक़त क़ुरआन की सही तफ़सीर, बल्कि सच तो ये है कि उर्दू ज़बान में क़ुरआन है। ”
(अलमिजान का इमाम अहमद रज़ा, सफ़ा 245)
📚 तज़किरा खानदान ए आला हज़रत, सफ़ा 73 - 74
✒️✒️ मिन जानिब :- इल्म की रौशनी
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