Teen Azeem ilmi Shankar Addaulatul Makkiya Bil Madatul Gaibiya

 


इमाम ए अहले सुन्नत सय्यदी आला हज़रत علیہ الرحمتہ و الرضوان का मुख़्तसर ताअरुफ़ 

तीन अज़ीम इल्मी शाहकार :-

2. अददौलतुल मकीय्या बिल मादतुल ग़ैबीया (1323 हिजरी) :- 

हरमैन शरीफ़ैन में आप की दूसरी बार हाजरी 1323 हिजरी 1906 इसवी में हुई। इसी सफ़र में हिंदी और नजदी वहाबीयों ने शाह हुजाज शरीफ़ अली पाशा के दरबार में मसअ'ला इल्में ग़ैब पेश किया था। साथ ही मुफ़्ती अहनाफ़ शेख़ सालेह कमाल मक्की  رحمتہ اللہ تعالیٰ علیہ की ख़िदमत में भी वहाबीया की जानिब से मसअ'ला इल्में ग़ैब के मुतल्लिक़ कुछ सवालात पेश हो चुके थे। मुफ़्ती अहनाफ़ का दर्जा उन दिनों शरीफ़ के बाद दूसरा शुमार होता था। मोसुफ़ ने वो सवाल आला हज़रत علیہ الرحمہ की ख़िदमत में पेश किए तो आप ने हालते बुख़ार में बग़ैर किसी किताब का सहारा लिए साढ़े आठ घंटे में फ़सीह अरबी ज़बान में इल्में ग़ैब जैसे अहम दीनी और इल्मी मौज़ु पर कई सो सफ़हात पर मुश्तमिल मअरकतुल आरा ज़ख़ीम किताब "अददौलतुल मकीय्या" लिखी। और मुन्किरीने इल्में ग़ैब के सवालों के ऐसे मुँह तोड़ जवाब लिखे कि औलमा ए मक्का अन्गुशते बदनदां रह गए। और मुन्किरीन का तो ऐसा मुँह बंद हुआ कि वो साकित व मबहुत हो कर रह गए। ये माएनाज़ इल्मी शाहकार और ताइदे ज़दी व नज़रे इनायते मुस्तफ़वी का ज़िन्दा सबुत 70 साल से लाजवाब है। और क़यामत तक लाजवाब ही रहेगा। क्योंकि

 اَلْاِسْلَامُ يَعْلُوْ وَلَايُعْلٰى

इस्लाम ग़ालिब ही रहता है। ये मग़लुब होने के लिए नहीं है।

ये रिसाला शरीफ़ मक्का के दरबार में मुन्किरीन व मुआनिदिन के रुबरु "रइसुल औलमा मौलाना शेख़ सालेह कमाल क़ाज़ी मक्का मुकर्रमा" ने पढ़ कर सुनाया। शरीफ़े मक्का ने निस्फ़ (आधा) किताब पूरी तवज्जो से सुनी और इस क़दर मुतासिर हुए कि बलन्द आवाज़ से फ़रमाया :-


اَللّٰهُ يُعْطِىْ وَهٰؤُ لٓاءِ يَمْنَعُوْنَ

तर्जमा :- अल्लाह तआला अपने हबीब “ﷺ” को इल्में ग़ैब देता है और ये लोग इन्कार करते हैं। उस वक़्त मुन्किरीन शाने रिसालत की जो रुसवाई हुई वो एक तारीख़ी वाक़्या है। 

📚 तज़किरा खानदान ए आला हज़रत, सफ़ा 72 - 73 

✒️✒️ मिन जानिब :- इल्म की रौशनी

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