सीरते मुस्तफ़ा صَلَّى اللَّهُ تَعَالٰى عَلَيْهِ وَسَلَّمَ , (पार्ट 8)
मौलुदुन्नबी صَلَّى اللَّهُ تَعَالٰى عَلَيْهِ وَسَلَّمَ
जिस मुक़द्दस मकान में हुज़ूरे अक़्दस “ﷺ” की विलादत हुई, तारीखे़ इस्लाम में उस मकाम का नाम "मौलुदुन्नबी ﷺ" (नबी की पैदाइश की जगह) है, ये बहुत ही मुतबर्रिक मक़ाम है। सलातीने इस्लाम ने इस मुबारक यादगार पर बहुत ही शानदार इमारत बना दी थी, जहां अहले हरमैने शरीफ़ैन और तमाम दुनिया से आने वाले मुसलमान दिन रात महफ़िले मीलाद शरीफ़ मुन्अक़िद करते और सलातो सलाम पढ़ते रहते थे। चुनान्चे हज़रते शाह वलिय्युल्लाह साहिब मुहद्दिसे देहलवी رضی اللہ تعالٰی عنہ ने अपनी किताब "फुयूज़ुल हरमैन" में तहरीर फ़रमाया है कि मैं एक मरतबा उस महफ़िले मीलाद में हाज़िर हुवा, जो मक्का ए मुकर्रमा में बारहवीं रबीउल अव्वल को "मौलुदुन्नबी ﷺ” में मुन्अक़िद हुई थी जिस वक्त विलादत का ज़िक्र पढ़ा जा रहा था तो मैं ने देखा कि यक बारगी उस मजलिस से कुछ अनवार बुलन्द हुए, मैं ने उन अनवार पर गौर किया तो मालूम हुवा कि वो रहमते इलाही और उन फ़रिश्तों के अनवार थे जो ऐसी महफ़िलों में हाज़िर हुवा करते हैं।
(फुयूज़ुल हरमैन)
जब हिजाज़ पर नज्दी हुकूमत का तसल्लुत हुवा तो मक़ाबिरे जन्नतुल मअला व जन्नतुल बक़ीअ के गुम्बदों के साथ साथ नज्दी हुकूमत ने इस मुक़द्दस यादगार को भी तोड़ फोड़ कर मिस्मार कर दिया और बरसों ये मुबारक मक़ाम वीरान पड़ा रहा, मगर मैं जब जून सन 1959 ई . में इस मरकज़े ख़ैरो बरकत की ज़ियारत के लिए हाज़िर हुवा तो मैं ने उस जगह एक छोटी सी बिल्डिंग देखी जो मुक़फ्फल थी। बा'ज़ अरबों ने बताया कि अब इस बिल्डिंग में एक मुख़्तसर सी लाइब्रेरी और एक छोटा सा मकतब है, अब इस जगह न मीलाद शरीफ़ हो सकता है न सलातो सलाम पढ़ने की इजाज़त है। मैं ने अपने साथियों के साथ बिल्डिंग से कुछ दूर खड़े हो कर चुपके चुपके सलातो सलाम पढ़ा, और मुझ पर ऐसी रिक्क़त तारी हुई कि मैं कुछ देर तक रोता रहा।
📚 सीरते मुस्तफ़ा ﷺ, बाब 2, सफ़ा 72-73
जारी है.....
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