बयान उन वजुह का जिनसे रोज़ा न रखने की इजाज़त है,
पार्ट 5
26. किसी ने हमेशा रोज़ा रखने की मन्नत मानी और बराबर रोज़े रखे तो कोई काम नहीं कर सकता जिससे गुज़र-बसर हो तो उसे ब-क़द्रे ज़रूरत इफ़्तार की इजाज़त है और हर रोज़े के बदले में फ़िदीया दे और उसकी भी क़ुव्वत न हो तो इस्तिग़फ़ार करे।
27. नफ़्ल रोज़ा क़स्दन शुरू करने से लाज़िम हो जाता है कि तोड़ेगा तो क़ज़ा वाजिब होगी और ये गुमान कर के कि उसके जिम्मे कोई रोज़ा है, शुरू किया बाद को मालूम हुआ कि नहीं है, अब अगर फ़ौरन तोड़ दिया तो कुछ नहीं और ये मालूम करने के बाद ना तोड़ा तो अब नहीं तोड़ सकता, तोड़ेगा तो क़ज़ा वाजिब होगी।
28. नफ़्ल रोज़ा क़स्दन नहीं तोड़ा बल्कि बिला इख़्तियार टूट गया, मसलन रोज़े के दरमियान में हैज़ आ गया, जब भी क़ज़ा वाजिब है।
29. ईदैन या अय्यामे तशरीक (बकरईद और उसके बाद के तीन दिन को अय्यामे तशरीक कहते हैं) में रोज़ा नफ़्ल रखा तो उस रोज़ा का पूरा करना वाजिब नहीं, ना उसके तोड़ने से क़ज़ा वाजिब, बल्कि उस रोज़ा का तोड़ देना वाजिब है और अगर उन दिनों में रोज़ा रखने की मन्नत मानी तो मन्नत पूरी करनी वाजिब है मगर उन दिनों में नहीं और दिनों में।
30. नफ़्ल रोज़ा बिला उज़्र तोड़ देना नाजाइज़ है, मेहमान के साथ अगर मेज़बान न खाएगा तो उसे नागवार होगा या मेहमान अगर खाना न खाएगा तो मेज़बान को तकलीफ़ होगी तो नफ़्ल रोज़ा तोड़ देने के लिए ये उज़्र है, बशर्ते कि ये भरोसा हो कि उसकी क़ज़ा रख लेगा और बशर्ते कि ज़हवेकुबरा से पहले तोड़े बाद को नहीं। ज़वाल के बाद मां-बाप की नाराज़गी के सबब तोड़ सकता है और उसमें भी अस्र के पहले तक तोड़ सकता है और अस्र के बाद नहीं।
31. किसी ने या क़सम खाई की अगर तू रोज़ा न तोड़े तो मेरी औरत को तलाक़ है, तो उसे चाहिए कि उसकी क़सम सच्ची कर दे यानी रोज़ा तोड़ दे अगरचे रोज़ा ए क़ज़ा हो अगरचे ज़वाल के बाद हो।
जारी है.........
📚 बहार ए शरीअ़त, जिल्द 1, हिस्सा 5, सफ़ा 1007
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कब रोज़ा न रखने की इजाज़त है?
Kab Roza Na Rakhne Ki Izazat Hai?

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