Bayan Un Wajuh Ka Jinse Roza Na Rakhne Ki Izazat Hai, Part 4



बयान उन वजुह का जिनसे रोज़ा न रखने की इजाज़त है,

पार्ट 4

 17. हर रोज़ा का फ़िदया  ब-क़द्रे सदक़ा ए फ़ित्र है  (यानी 2 किलो 45 ग्राम गेहूँ या 4 किलो 90 ग्राम जौ या इनकी कीमत) और तिहाई माल में वसियत उस वक़्त जारी होगी, जब उस मय्यत के वारिस भी हों और अगर वारिस न हों और सारे माल से फ़िदीया अदा होता हो तो सब फ़िदीया में सर्फ़ (ख़र्च) कर देना लाज़िम है। यूँही अगर वारिस सिर्फ़ शौहर या ज़ौजा (बीवी) है तो तिहाई निकालने के बाद उन का हक़ दिया जाए, उसके बाद जो कुछ बचे अगर फ़िदीया में सर्फ़ हो सकता है तो सर्फ़ कर दिया जाएगा। 

 18. वसियत करना सिर्फ़ उतने ही रोज़ों के हक़ में वाजिब है जिन पर क़ादिर हुआ, था मसलन दस क़ज़ा हुए थे और उज़्र जाने के बाद पाँच पर क़ादिर हुआ था कि इंतक़ाल हो गया तो पांच ही की वसीयत ही वाजिब है। 

 19. एक शख़्स की तरफ़ से दूसरा शख़्स रोज़ा नहीं रख सकता।

 20. एतकाफ़ वाजिब और सदक़ा ए फ़ित्र का बदला अगर वरसा (वारिस) अदा कर दें तो जाइज़ है और उनकी मिक़दार, वही ब-क़द्रे सदक़ा ए फ़ित्र है और ज़कात देना चाहें तो जितनी वाजिब थी उस कद्र निकालें। 

 21. शैख़ फ़ानी यानी वो बूढ़ा जिसकी उम्र ऐसी हो गई कि अब रोज़-ब-रोज़ कमज़ोर ही होता जाएगा, जब वो रोज़ा रखने से आजिज़ हो यानी ना अब रख सकता है ना आइन्दा उसमें इतनी ताक़त आने की उम्मीद है कि रोज़ा रख सकेगा, उसे रोज़ा ना रखने की इजाज़त है और हर रोज़ा के बदले में फ़िदीया यानी दोनों वक़्त एक मिस्कीन को भर पेट खाना खिलाना उस पर वाजिब है या हर रोज़ा के बदले में सदक़ा ए फ़ित्र की मिक़दार मिस्कीन को दे दे। 

 22. अगर ऐसा बूढ़ा गर्मियों में गर्मी की वजह से रोज़ा नहीं रख सकता, मगर जाड़ों में रख सकेगा तो अब इफ़्तार कर ले और उनके बदले में जाड़ों में रखना फ़र्ज़ है।  

 23. अगर फ़िदीया देने के बाद इतनी ताक़त आ गई कि रोज़ा रख सके, तो फ़िदीया सदक़ा ए नफ़्ल होकर रह गया उन रोज़ों की क़ज़ा रखे। 

 24. ये इख़्तियार है कि शुरू रमज़ान ही में पूरे रमज़ान का एक दम फ़िदीया दे दे या आख़िर में दे और इसमें तमलीक (मालिक बना देना) शर्त नहीं बल्कि इबाहत भी काफ़ी है (मसलन खाना मिस्कीन को अपने घर बुला कर खिला देना) और ये भी ज़रूर नहीं कि जितने फ़िदये हों उतने ही मिस्कीनों को दे बल्कि एक मिस्कीन को कई दिन के फ़िदये दे सकते हैं। 

 25. क़सम या क़त्ल के कफ़्फ़ारा का उस पर रोज़ा है और बुढ़ापे की वजह से रोज़ा नहीं रख सकता तो उस रोज़ा का फ़िदीया नहीं और रोज़ा तोड़ने या ज़िहार का कफ़्फ़ारा उस पर है, तो अगर रोज़ा न रख सके साठ मिसकीनों को खाना खिलावे।

जारी है........

📚 बहार ए शरीअ़त, जिल्द 1, हिस्सा 5, सफ़ा 1005 - 1006

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