अमीरुल मोमिनीन हज़रते सय्यदुना उस्मान ए ग़नी رضی اللہ تعالیٰ عنہ
(पार्ट 4)
रहम दिली
ऐसी कि ख़ादिम या ग़ुलाम के आराम का ख़्याल करते और रात के वक़्त कोई काम पड़ता तो ख़ादिमों को जगाना मुनासिब ख़्याल ना करते और अपना काम अपने हांथ से कर लेते थे।
दिल जोई
ऐसी प्यारी आदत की एक मर्तबा हज़रत ए मुग़ैरा बिन शोएबा رضی اللہ تعالیٰ عنہ के ग़ुलाम का निकाह हुआ तो उसने आपको शिर्कत की दावत दी। आप رضی اللہ تعالیٰ عنہ तशरीफ़ लाए और फ़रमाया मैं रोज़े से हुँ मगर मैंने ये पसंद किया कि तुम्हारी दावत को क़ुबूल करुं और तुम्हारे लिए बरकत की दुआ़ करुं।
इबादत गुज़ार
ऐसे थे कि रात के इब्तदाई हिस्से में आराम करके रात भर इबादत करते रहते जबकि दिन नफ़्ली रोज़े में गुज़रता।
तिलावत ए क़ुरआन के आशीक़
ऐसे कि एक रक्अ़त में ख़त्मे क़ुरआन कर लेते थे। ख़ुद फ़रमाया करते थे :- अगर तुम्हारे दिल पाक हों तो कलामे इलाही से कभी भी सीर ना हों।
फ़िक्रे आख़िरत
दस जन्नती सहाबा में शामिल होने के बावजूद भी ऐसी कि जब किसी क़ब्र के पास खड़े होते तो इस क़द्र रोते कि आंसुओं से आप رضی اللہ تعالیٰ عنہ की दाढ़ी मुबारक तर हो जाती।
इत्तेबाए सुन्नत का जज़्बा
ऐसा कि मस्जिद के दरवाज़े पर बैठ कर बकरी की दस्ती का गौस्त मंगवाया और खाया और बग़ैर ताज़ा वुज़ू किए नमाज़ अदा की फिर फ़रमाया कि रसूलल्लाह “ﷺ” ने भी इसी जगह बैठ कर यही खाया था और इसी तरह किया था।
जारी है.......
📚 माहनामा फ़ैज़ान ए मदीना, सितम्बर 2017
✒️✒️ मिन जानिब :- इल्म की रौशनी

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