Aaina E Qayamat, Part 2

 


आईना ए क़ियामत, 

(पार्ट - 2) 

फ़ज़ाइले इमाम हसन व हुसैन رضی اللہ تعالیٰ عنہما

एक बार हज़रते इमामे हसन رضی اللہ تعالیٰ عنہ हाज़िरे ख़िदमत अक़दस होकर हुज़ूर पुरनूर “ﷺ” के  शानए मुबारक पर सवार हो गए, एक साहब ने अ़र्ज़ की :- साहबज़ादे आपकी सवारी कैसी अच्छी सवारी है! हुज़ूरे अक़दस “ﷺ” ने फ़रमाया :- "और सवार कैसा अच्छा सवार है!"

हुज़ूर पुरनूर “ﷺ” सजदे में थें कि इमामे हसन رضی اللہ تعالیٰ عنہ पुश्त मुबारक से लिपट गए, हुज़ूर “ﷺ” ने सजदे को तुल दिया के सर उठाने से कहीं गिर ना जाए।

इमामे हसन और इमामे हुसैन رضی اللہ تعالیٰ عنہما की निसबत इरशाद होता है :- "हमारे ये दोनों बेटे जवानाने जन्नत के सरदार हैं।"

और फ़रमाया जाता है :- "इन का दोस्त हमारा दोस्त, और इन का दुश्मन हमारा दुश्मन है।"

और फ़रमाते हैं :- "ये दोनों अ़र्श के तलवारें हैं।" 

और फ़रमाते हैं :-" हुसैन मुझ से है और मैं हुसैन से हुँ, अल्लाह दोस्त रखे उसे जो हुसैन को दोस्त रखे, हुसैन सिब्त है इस्बात से।"

एक रोज़ हुज़ूर पुरनूर “ﷺ” के दाहिने ज़ानु पर इमामे हुसैन رضی اللہ تعالیٰ عنہ और बाएं पर हुज़ूर “ﷺ” के साहबज़ादे हज़रते इब्राहीम رضی اللہ تعالیٰ عنہ बैठे थें। हज़रते जिबरइल علیہ السلام हाज़िर हो कर अ़र्ज़ की कि, इन दोनों को ख़ुदा हुज़ूर “ﷺ” के पास ना रखेगा एक को इख़्तियार फ़रमा लीजिए। हुज़ूर “ﷺ” ने इमामे हुसैन رضی اللہ تعالیٰ عنہ की जुदाई गवारा ना फ़रमाई, तीन दिन के बाद हज़रते इब्राहीम رضی اللہ تعالیٰ عنہ का इन्तिक़ाल हो गया। इस वाक़्ये के बाद जब हाज़िर होते, आप “ﷺ” बोसे लेते और फ़रमाते :- مَرْ حبًا بِمَنْ فَدَيْتُهٗ بِاِبْنِىْ ऐसे को मरहबा जिस पर मैं ने अपना बेटा क़ुरबान किया।

         और फ़रमाते हैं :- ये दोनों मेरे बेटे और मेरी बेटी के बेटे हैं, इलाही! मैं इनको दोस्त रखता हुँ तु भी इन्हें दोस्त रख और उसे दोस्त रख जो इन्हें दोस्त रखे।

        बतूल ज़हरा رضی اللہ تعالیٰ عنہا से फ़रमाते :- "मेरे दोनों बेटों को लाओ, फिर दोनों को सुघंते और सिना ए अनवर से लगा लेते।"

📚 आईना ए क़ियामत, सफ़ा 12-14

जारी है.......

✒️✒️मिन जानिब:- इल्म की रौशनी 


Aaina E Qayamat Hindi 

Allama Hasan Raza Khan Sahab Barelvi

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