आईना ए क़ियामत,
(पार्ट - 4)
सरकार “ﷺ” और ख़ानदाने सरकार का फ़क़्रे इख़्तियारी :-
हमारे हुज़ूर “ﷺ” को ख़ुदा عزوجل ने अफ़ज़ल तरीन मख़लुक़ बनाया और महबूबिय्यते ख़ास का ख़लअते फ़ाख़िरा अ़ता फ़रमाया। इसी वजह से दुनिया की जो बलाएं आप “ﷺ” ने उठाई और जो मुसीबतें आप “ﷺ” ने बरदाश्त कीं किसी से इन का तहम्मुल मुमकिन नहीं।
अल्लाह अल्लाह! महबूबिय्यत की तो वो अदाएं कि फ़रमाया जाता है :-
لَوْ لَاكَ لَمَا خَلَقْتُ الدُّنْيَا
ऐ महबूब मैं अगर तुम को ना पैदा करता तो दुनिया ही को ना बनाता।
उ़लुवे मर्तबत की वो कैफ़िय्यतें कि अपने ख़ज़ाने की कुन्जियां दे कर म़ुख्तारे कुल बना दिया कि जो चाहो करो, सियाह व सपेद का तुम्हें इख़्तियार है ।
ऐसे बादशाह जिन के मुक़द्दस सर पर दोनों आ़लम की हुकूमत का चमकता ताज रखा गया, ऐसे रिफ़्अ़त पनाह, जिन के मुबारक पाउं के नीचे तख़्ते इलाही बिछाया गया, शाही लंगर के फ़क़ीर, सलातीने आ़लम, सुल्तानी बाड़े के मोहताज, शाहाने मुअ़ज्ज़म, दुनिया की नेअ़मतें बांटने वाले, ज़माने की दौलतें देने वाले, भिकारियों की झोलियां भरें, मुंह मांगी मुरादें पूरी करें। अब काशानए अक़दस और दौलत सराए मुक़द्दस की तरफ़ निगाह जाती है अल्लाह तआ़ला की शान नज़र आती है। ऐसे जलीलुल क़द्र बादशाह जिन की क़ाहिर हुकूमत मशरिक़ मग़रिब को घेर चुकी और जिन का डंका हफ़्त आसमान व तमाम रूए ज़मीन में बज रहा है, इन के बर्गुज़ीदा घर में आसाइश की कोई चीज़ नहीं, आराम के अस्बाब तो दर कनार, ख़ुश्क खजूरें और जव के बे छने आटे की रोटी भी तमाम उ़म्र पेट भर कर ना खाई।
कुल जहां मिल्क और जव की रोटी ग़िज़ा
उस शिकम की क़नाअ़त पे लाखों सलाम
शाही लिबास देखिए तो सतरह सतरह पैवन्द लगे हैं वो भी एक कपड़े के नहीं। दो दो महीने सुल्तानी बावर्ची ख़ाने से धुवां बुलन्द नहीं होता। दुनयवी ऐशो इशरत की तो ये कैफ़िय्यत है, दीनी वजाहत देखिए तो इस कमली वाले ताज़दार “ﷺ” की शौकत और इस सादगी पसन्द की वजाहत से दोनों आलम गूंज रहे हैं :
मालिके कौनैन हैं गो पास कुछ रखते नहीं
दो जहां की नेअ़मतें हैं इन के ख़ाली हाथ में
यहां ये अम्र भी बयान कर देने के क़ाबिल है कि ये तक्लीफ़ें, ये मुसीबतें मह्ज़ अपनी ख़ुशी से उठाई गई, इस में मजबूरी को हरगिज़ दख़्ल ना था।
एक बार आप के बिही ख़्वाह और रिज़ाजू दोस्त جل جلاله ने पयाम भेजा कि "तुम कहो तो मक्का के दो पहाड़ों को (जिन्हें अख़्शबैन कहते हैं) सोने का बना दूं कि वो तुम्हारे साथ रहें। अ़र्ज़ की : " ये चाहता हूं कि एक दिन दे कि शुक्र बजा लाऊं, एक दिन भूका रख कि सब्र करूं।"
मुसलमानो! अल्लाह तआ़ला ने हमारे हुज़ूर “ﷺ” को नफ़्से मुत़मइन्ना अ़ता फ़रमाया है। अगर आप ऐशो इशरत में बसर फ़रमाते और आसाइश व राह़त महबूब रखते, तो आप “ﷺ” का परवर दिगार आप “ﷺ” की ख़ुशी पर ख़ुश होने वाला दुनिया में जन्नतों को उतार कर रख देता, और ये सामाने ऐश आप “ﷺ” के बर्गुज़ीदा और पाक नफ़्स में हरगिज़ तग़य्युर पैदा न कर सकता, ऐसी हालत में ये बला पसन्दी और मुसीबत दोस्ती इसी बुन्याद पर हो सकती है कि आप रह़्मतुल्लिल आ़लमीन ठहरे, दुनिया की हर चीज़ के हक़ में रह़मत हो कर आए, अगर आप “ﷺ” ऐशो इशरत में मश्ग़ूल रहते तो " तक्लीफ़ व मुसीबत" जिन से आक़िबत में हुज़ूर “ﷺ” ग़ुलामों को भी सरोकार ना होगा, बरकात से महरूम रह जातीं।
एक बार हुज़ूर “ﷺ” मुसलमानों को कनीज़ें और ग़ुलाम तक़्सीम फ़रमा रहे थे, मौला अ़ली كرم الله تعالىٰ وجهه الكريم ने हज़रते बतूल ज़हरा رضی اللہ تعالیٰ عنہا से कहा : "जाओ तुम भी अपने लिए कोई कनीज़ ले आओ।" हाज़िर हुईं और हांथ दिखा कर अ़र्ज़ करने लगीं कि “चक्कियां पीसते पीसते हाथों में छाले पड़ गए हैं एक कनीज़ मुझे भी इनायत हो।" इरशाद हुआ : "ऐ फातिमा ! मैं तुझे ऐसी चीज़ बताता हूं जो कनीज़ व ग़ुलाम से ज़्यादा काम दे, तू रात को सोते वक़्त سبحان الله 33 बार الحمد لله 33 बार, الله اكبر 34 बार पढ़ कर सो रहा कर।"
एक बार हुज़ूरे पुरनूर “ﷺ” हज़रते फ़ातिमा رضی اللہ تعالیٰ عنہا के काशाने में तशरीफ़ ले गए, दरवाज़े तक रौनक़ अफ़रोज़ हुवे थे कि फ़ातिमा رضی اللہ تعالیٰ عنہا के हाथों में चांदी की एक चूड़ी मुलाह़ज़ा फ़रमाई, वापस तशरीफ़ ले आए, हज़रते बतूल رضی اللہ تعالیٰ عنہا ने वोह चूड़ियां हाज़िर कर दीं कि इन्हें तसद्दुक़ कर दीजिए। मसाकीन को अ़ता़ फ़रमा दी गईं और दो चूड़ियां आ़ज की मर्हमत हुई और इरशाद हुआ : "फ़ातिमा ! दुनिया, मुह़म्मद और आले मुह़म्मद के लाइक़ नहीं" “ﷺ”
उमरे फ़ारूक़ رضی اللہ تعالیٰ عنہ हाज़िर आए, देखा कि खजूर की चटाई पर आराम फ़रमा रहे हैं, और इस नाज़ुक जिस्म और नाज़नीन बदन पर बोरे के निशान बन गए हैं, ये हालत देख कर बे इख़्तियार रोने लगे और अर्ज़ की, कि "या रसूलल्लाह ! क़ैसरो किसरा, ख़ुदा के दुश्मन, नाज़ो नेअ़मत में बसर करें और ख़ुदा का महबूब तक्लीफ़ व मुसीबत में ? इरशाद हुआ : “क्या तू इस अम्र पर राज़ी नहीं कि उन्हें दुनिया के ऐश मिलें और तू उक़्बा की ख़ूबियों से बहरावर हो ?
📚 आईना ए क़ियामत, सफ़ा 15-18
जारी है.........
✒️✒️ मिन जानिब :- इल्म की रौशनी

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