Seerat Hazrate Siddique Akbar Radiallahu Taala Anhu Ke 15 Bemisaal Fazail, Part 3

 








हज़रते सिद्दीक़ ए अकबर رضی اللہ تعالیٰ عنہ के 15 बेमिसाल फ़ज़ाइल 

(पार्ट - 3)

(6) सिर्फ़ अबु बक्र का दरवाज़ा खुला रहेगा :- नबी ए करीम “ﷺ” ने अपनी आख़री अय्याम में हुक्म इरशाद फ़रमाया :- मस्जिदे (नबवी) में किसी का दरवाज़ा बाक़ी ना रहे, मगर अबु बक्र का दरवाज़ा बन्द ना किया जाए।

(7) जन्नत में पहले दाख़िला :- हुज़ूरे अकरम “ﷺ” ने इरशाद फ़रमाया : जिब्रीले अमीन علیہ السلام मेरे पास आए और मेरा हांथ पकड़ कर जन्नत का वो दरवाज़ा दिखाया जिससे मेरी उम्मत जन्नत में दाख़िल होगी। हज़रते सय्यदुना अबु बक्र सिद्दीक़ رضی اللہ تعالیٰ عنہ ने अर्ज़ की : या रसूलल्लाह! मेरी ये ख़्वाहिश है कि मैं भी उस वक़्त आपके साथ होता, ताकि मैं भी उस दरवाज़े को देख लेता। रहमते आलम “ﷺ” ने फ़रमाया : अबु बक्र मेरी उम्मत में सबसे पहले जन्नत में दाख़िल होने वाले शख़्स तुम ही होगे।

(8) तीन लुक़्मे और तीन मुबारक बादें :- एक मर्तबा नबी ए करीम “ﷺ” ने खाना तैयार किया और सहाबा ए किराम رضی اللہ تعالیٰ عنہم को बुलाया, सबको एक एक लुक़्मा अ़ता किया जबकि हज़रत ए अबु बक्र सिद्दीक़ رضی اللہ تعالیٰ عنہ को तीन लुक़्मे अ़ता किए। हज़रत ए सय्यदुना अब्बास رضی اللہ تعالیٰ عنہ ने इसकी वजह पुछी तो इरशाद फ़रमाया : जब पहला लुक़्मा दिया तो हज़रते जिब्रील علیہ السلام ने कहा : ऐ अतीक़ तुझे मुबारक हो, जब दुसरा लुक़्मा दिया तो हज़रते मिकाइल علیہ السلام ने कहा : ऐ रफ़ीक़ तुझे मुबारक हो, तीसरा लुक़्मा दिया तो अल्लाह करीम ने फ़रमाया : ऐ सिद्दीक़ तुझे मुबारक हो।

(9) सबसे अफ़ज़ल :- हज़रते सय्यदुना अबु दरदा رضی اللہ تعالیٰ عنہ का बयान है कि नबियों के सरदार “ﷺ” ने मुझे अबु बक्र सिद्दीक़ رضی اللہ تعالیٰ عنہ के आगे चलते हुए देखा तो इरशाद फ़रमाया : क्या तुम उसके आगे चल रहे हो जो तुमसे बेहतर है। क्या तुम नहीं जानते के नबियों और रसूलों के बाद अबु बक्र से अफ़ज़ल किसी शख़्स पर ना तो सुरज तुलूअ़ हुआ और ना ही ग़ुरुब हुआ।

(10) घर के सेहन में मस्जिद :- हिजरत से क़ब्ल हज़रते अबु बक्र सिद्दीक़ رضی اللہ تعالیٰ عنہ ने अपने घर के सेहन में मस्जिद बनाई हुई थी। चुनान्चे हज़रते सय्यदुना आईशा رضی اللہ تعالیٰ عنہا फ़रमाती हैं : मैंने होश सम्भाला तो वालिदैन दीने इस्लाम पर अ़मल करते थे, कोई दिन ना गुज़रता मगर रसूलुल्लाह “ﷺ” के दोनों किनारों सुबह व शाम हमारे घर तशरीफ़ लाते। फिर हज़रते अबु बक्र को ख़्याल आया कि वो अपने घर के सेहन में मस्जिद बना लें, फिर वो उसमें नमाज़ पढ़ते थे और (बलन्द आवाज़ से) क़ुरआन मजीद पढ़ते थे, मुश्रिकीन के बेटे और उनकी औरतें सब उसको सुनते और ताअज्जुब करते और हज़रते अबु बक्र की तरफ़ देखते थे।

जारी है.......

📚 माहनामा फ़ैज़ाने मदीना, फ़रवरी 2020, सफ़ा 31-32 

✒️✒️ मिन जानिब :- इल्म की रौशनी

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