मुहर्रम मे क्या जाइज़? क्या नाजाइज़?
(पार्ट 17)
📋 ताज़ियादारी बन सकती है कभी बूत परस्ती
ताज़ियादार अगरचे हमारे सुन्नी मुसलमान भाई ही हैं खुदाए पाक उन्हें समझ अता फ़रमाए। ताज़ियादारी और उसके साथ जो ख़िलाफ़े शरअ काम वो करते हैं उससे महफ़ूज़ फ़रमाए , लेकिन चूंकि ताज़िया एक मुजस्समा है, लोग इसमें तरह तरह के फ़ोटो और तस्वीरें भी लगाने लगे हैं उसको चूमते बल्कि सज्दे तक करने लगे हैं, चढ़ावे भी चढ़ाये जाने लगे हैं यानी मुशरिक लोग अपने बुतों के साथ जो करते हैं एअतिक़ादन न सही अमलन वो सब कुछ होने लगा है, ख़तरा महसूस हो रहा है कि ताज़ियादारी कहीं आने वाले वक़्त में बूत परस्ती न बन जाए, क्योंकि सब लोग पढ़े लिखे और समझदार नहीं होते, अनपढों जाहिलों की भी दुनियां में कमी नहीं है।
लिहाज़ा मैं अपने सुन्नी अवाम व ख़ास भाइयों से गुज़ारिश करूँगा की वो ख़ुद भी इससे बाज़ रहें और दूसरों को भी प्यार व मुहब्बत से समझाकर बाज़ रखने की कोशिश करें।
जारी है.........
📚 मुहर्रम मे क्या जाइज़? क्या नजाइज़?, सफ़ा 38
✍🏻 मौलाना तत्हीर अहमद रज़वी बरेलवी
✒️✒️ मिन जानिब :- इल्म की रौशनी
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